वॉशिंगटन – अमेरिका में इमिग्रेशन कानूनों को लेकर जारी विरोध प्रदर्शनों ने एक नया मोड़ ले लिया है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी झंडे को जलाने वालों को कड़ी फटकार लगाई है और उन्हें “जानवर” तक कह दिया। ट्रंप ने चेतावनी दी है कि ऐसे लोगों को जेल की सजा का सामना करना पड़ सकता है।
🇺🇸 झंडा जलाना बना नया मुद्दा
लॉस एंजिल्स में चल रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान कई प्रदर्शनकारियों को अमेरिकी झंडा जलाते हुए देखा गया। ट्रंप ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी और कहा:
“वे अमेरिकी ध्वज नहीं उठाते, बल्कि उसे जलाते हैं और गर्व से विदेशी झंडे लेकर चलते हैं। ऐसे लोग अमेरिका से प्यार नहीं करते।”
ट्रंप ने यह बयान फोर्ट ब्रैग में अमेरिकी सेना की 250वीं वर्षगांठ के मौके पर दिया। उन्होंने कहा कि वे ऐसे कृत्य को अपराध घोषित करने की संभावनाएं तलाश रहे हैं और इसके लिए एक साल तक की जेल का प्रस्ताव विचाराधीन है।
🔥 विरोध की पृष्ठभूमि क्या है?
जनवरी 2025 में लागू हुई नई इमिग्रेशन नीति के तहत अमेरिका में अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू की गई। इसका सीधा असर लॉस एंजिल्स जैसे सैंक्चुअरी शहरों पर पड़ा, जहां 6 जून से विरोध प्रदर्शन शुरू हुए।
7 जून को प्रदर्शन तेज हुए और पैरामाउंट व कॉम्पटन में प्रदर्शनकारियों ने सड़कों पर जाम लगाया। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस और रबर बुलेट्स का इस्तेमाल किया।
🪖 नेशनल गार्ड की तैनाती और सियासी टकराव
स्थिति नियंत्रण से बाहर होती देख ट्रंप ने पहले 300 नेशनल गार्ड सैनिकों को और बाद में 700 मरीन जवानों को लॉस एंजिल्स भेजा।
इस कदम की आलोचना करते हुए कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूसोम ने इसे राज्य अधिकारों का उल्लंघन बताया और ट्रंप प्रशासन के खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू कर दी।
🎙️ ट्रंप का दोहराया कड़ा रुख
एक पॉडकास्ट बातचीत में ट्रंप ने अपने रुख को और स्पष्ट किया:
“अगर कोई अमेरिकी झंडा जलाता है, तो उसे कम से कम एक साल के लिए जेल भेजा जाना चाहिए। हम इस कानून के लिए सीनेटरों से बात कर रहे हैं।”
उन्होंने यह भी संकेत दिए कि प्रशासन विरोध प्रदर्शनों की फंडिंग की जांच कर रहा है, ताकि यह पता चल सके कि प्रदर्शन के पीछे कौन है।
🧭 निष्कर्ष
अमेरिकी झंडे का अपमान और इमिग्रेशन नीतियों के खिलाफ बढ़ते प्रदर्शनों ने अमेरिका की राजनीति में एक बार फिर ध्रुवीकरण बढ़ा दिया है। जहां ट्रंप कड़ी कार्रवाई की बात कर रहे हैं, वहीं आलोचक इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राज्य संप्रभुता पर हमला मान रहे हैं।
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