20 जून 2025
इसराइल द्वारा हाल ही में शुरू किए गए ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ ने न केवल पश्चिम एशिया में अशांति को बढ़ाया है, बल्कि रूस को भी एक असहज स्थिति में ला खड़ा किया है। मॉस्को के अधिकारियों ने इसे ‘गंभीर’ और ‘संभावित रूप से खतरनाक’ घटनाक्रम कहा है।
हालांकि कुछ रूसी विश्लेषकों का मानना है कि इससे रूस को अल्पकालिक लाभ मिल सकता है — जैसे तेल की वैश्विक कीमतों में उछाल से निर्यात राजस्व में वृद्धि, और यूक्रेन युद्ध से वैश्विक ध्यान का हटना। एक रूसी अख़बार ने इसे यहां तक कहा: “कीएव को भुला दिया गया है।”
लेकिन यह राहत अस्थायी हो सकती है
रूसी मीडिया में कुछ ऐसी भी अटकलें हैं कि यदि रूस इस संघर्ष में मध्यस्थता की भूमिका निभा पाता है, तो वह खुद को मध्य पूर्व में एक जिम्मेदार और प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है — भले ही वह यूक्रेन में युद्ध लड़ रहा हो।
परंतु जैसे-जैसे इसराइली सैन्य अभियान लंबा होता जा रहा है, रूस में यह चिंता बढ़ती जा रही है कि इस लड़ाई से उसे नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।
रणनीतिक संबंधों की सीमाएं
राजनीतिक विश्लेषक आंद्रेई कोर्तुनोव ने ‘कोमर्सांट’ में लिखा कि इस क्षेत्रीय संघर्ष के और गहराने से रूस के लिए रणनीतिक खतरे उत्पन्न हो सकते हैं। उन्होंने इस तथ्य की ओर इशारा किया कि रूस ईरान के खिलाफ इसराइल के हमलों को रोकने में नाकाम रहा — जबकि कुछ ही महीने पहले उसने तेहरान के साथ एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी समझौता किया था।
यह समझौता कोई सैन्य गठबंधन नहीं था, इसलिए रूस को ईरान की रक्षा के लिए बाध्य नहीं किया गया। हालांकि रूस ने उस वक्त इसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर प्रस्तुत किया था और सुरक्षा सहयोग पर ज़ोर देने की बात कही थी।
सीरिया के बाद ईरान पर मंडराता खतरा
बीते छह महीनों में रूस ने पश्चिम एशिया में एक अहम सहयोगी खो दिया — सीरिया के पूर्व राष्ट्रपति बशर अल असद। असद को सत्ता से हटाए जाने के बाद रूस ने उन्हें राजनीतिक शरण दी थी। अब अगर ईरान में भी सत्ता परिवर्तन होता है, तो रूस एक और रणनीतिक साझेदार खो सकता है — और यही बात मॉस्को की चिंता का बड़ा कारण है।
‘मॉस्कोव्स्की कोम्सोमोलेट्स’ में हाल ही में छपा: “विश्व राजनीति में बड़े बदलाव तेजी से हो रहे हैं, जिनका असर हमारे देश पर सीधे या परोक्ष रूप से पड़ेगा।”
पुतिन की नई कूटनीतिक रणनीति
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इन दिनों सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मंच की मेज़बानी कर रहे हैं। एक समय इस मंच की तुलना ‘दावोस’ से की जाती थी, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों की दूरी के चलते इसका स्वरूप बदल गया है। फिर भी रूस इस आयोजन के माध्यम से यह संदेश देना चाहता है कि उसे वैश्विक मंचों से अलग-थलग नहीं किया जा सकता।
हालांकि मंच आर्थिक विषयों पर केंद्रित है, लेकिन पुतिन पश्चिम एशिया और यूक्रेन को लेकर क्या रुख अपनाते हैं — यह वैश्विक विश्लेषकों की नज़र में रहेगा।
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