नई दिल्ली:
आज जिसे अमेरिका ईरान का परमाणु खतरा मानता है, उसकी शुरुआत खुद वॉशिंगटन की एक ‘शांति मिशन’ पहल से हुई थी — Atoms for Peace, जिसे 1953 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट आइजनहावर ने शुरू किया था। इसका उद्देश्य मित्र राष्ट्रों के साथ शांतिपूर्ण परमाणु तकनीक साझा करना था।
तेहरान में पहला परमाणु रिएक्टर — अमेरिकी मदद से
1960 के दशक में ईरान, शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के अधीन एक पश्चिम समर्थक, धर्मनिरपेक्ष और आधुनिकीकरण की ओर अग्रसर राष्ट्र था। अमेरिका ने इसे आदर्श शीत युद्ध साझेदार मानते हुए परमाणु अनुसंधान रिएक्टर लगाने में मदद की, ईरानी वैज्ञानिकों को एमआईटी जैसे संस्थानों में प्रशिक्षित किया, और यूरोपीय सहयोगियों को भी इस प्रयास में जोड़ा।
“हमने उन्हें परमाणु तकनीक की बुनियाद दी”: अमेरिकी विशेषज्ञ
ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन के वरिष्ठ विश्लेषक और पूर्व अमेरिकी परमाणु वार्ताकार रॉबर्ट आइन्हॉर्न ने कहा,
“हमने ईरान को उसका स्टार्टिंग किट दिया था। उस दौर में परमाणु प्रसार को लेकर चिंता कम थी, इसलिए हम बड़े आराम से तकनीक बांटते थे।”
शाह की महत्त्वाकांक्षा और पश्चिम की चिंता
तेल से भरपूर होने के बावजूद, शाह चाहते थे कि ईरान परमाणु शक्ति बने — न केवल ऊर्जा उत्पादन के लिए, बल्कि एक राष्ट्रीय गौरव के रूप में। फ्रांस और जर्मनी ने बड़े परमाणु सौदों पर हस्ताक्षर किए।
हालांकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां अब चौकन्नी हो गई थीं, विशेष रूप से यूरेनियम संवर्धन (enrichment) पर, जो कि परमाणु हथियार निर्माण में भी इस्तेमाल हो सकता था।
1979 की इस्लामी क्रांति और नई राह
जब 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति हुई, तो शाह की सत्ता खत्म हो गई और अमेरिका विरोधी धार्मिक शासन आया। शुरू में, नए शासकों ने परमाणु परियोजना में खास रुचि नहीं दिखाई — यह महंगी थी और शाह की विरासत मानी जाती थी।
इराक युद्ध और परमाणु नीति में बदलाव
1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान रासायनिक हथियारों के प्रयोग और बड़े नुकसान ने ईरानी नेतृत्व को सुरक्षा और प्रतिरोध के नए साधनों पर विचार करने को मजबूर किया। अब परमाणु ऊर्जा उन्हें रणनीतिक सुरक्षा के रूप में दिखने लगी।
पाकिस्तान से मदद और अणु बम की ओर पहला कदम
अब अमेरिका से नहीं, ईरान ने परमाणु सहायता ली पाकिस्तान से — खासकर डॉ. ए.क्यू. खान से, जिन्होंने चोरी किए गए यूरोपीय डिज़ाइनों के ज़रिए ईरान को सेंट्रीफ्यूज तकनीक दी। यह ईरान के लिए परमाणु हथियार निर्माण की ठोस शुरुआत थी।
2000 के दशक में दुनिया को हुआ एहसास
ईरान के गुप्त परमाणु संवर्धन स्थलों का पता लगते ही अमेरिका और उसके सहयोगी सतर्क हो गए। ईरान ने कहा कि यह सब कुछ परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के तहत वैध है, लेकिन पश्चिम को संदेह था।
बातचीत से टकराव तक का सफर
संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध, गुप्त ऑपरेशन और साइबर हमलों से परमाणु कार्यक्रम रोकने की कोशिशें हुईं।
2015 में हुई जेसीपीओए (JCPOA) संधि ने थोड़े समय के लिए राहत दी, लेकिन 2018 में ट्रंप प्रशासन के बाहर निकलने से फिर तनाव बढ़ गया।
और अब… हम वहीं हैं, जहां कभी शुरू हुए थे
आज जब अमेरिकी बमवर्षक ईरान के परमाणु केंद्रों पर हमला करते हैं, तो वह उसी प्रणाली को खत्म करने की कोशिश करते हैं, जिसे उन्होंने ही कभी बनाया और पोषित किया था।
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