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क्रिकेट में DRS क्या है और इसका इस्तेमाल कैसे होता है?

DRS यानी Decision Review System एक तकनीक है, जिसका इस्तेमाल क्रिकेट में अंपायर के फैसले की समीक्षा करने के लिए किया जाता है। जब किसी खिलाड़ी को आउट या नॉट आउट दिया जाता है और वह उस फैसले से संतुष्ट नहीं होता, तो वह कप्तान की सलाह से DRS ले सकता है। इसके जरिए थर्ड अंपायर तकनीकी उपकरणों की मदद से दोबारा जांच करता है कि फैसला सही था या नहीं।

इस सिस्टम में कुछ खास तकनीकें होती हैं जैसे हॉक-आई, जो गेंद की दिशा बताता है; अल्ट्रा-एज या स्निकोमीटर, जो जांचता है कि गेंद और बल्ले में संपर्क हुआ या नहीं; और हॉटस्पॉट, जो इंफ्रारेड इमेज से संपर्क दिखाता है। जब खिलाड़ी DRS लेता है, तो थर्ड अंपायर इन तकनीकों का इस्तेमाल करके फाइनल फैसला देता है।

DRS लेने के लिए खिलाड़ी को अंपायर के फैसले के 15 सेकंड के अंदर ‘T’ का इशारा करना होता है। अगर रिव्यू सही निकलता है तो वह टीम का रिव्यू बरकरार रहता है, लेकिन अगर गलत होता है तो वह रिव्यू खत्म हो जाता है।

DRS का इस्तेमाल क्रिकेट में इसलिए शुरू हुआ ताकि अंपायर की गलतियों को सुधारा जा सके और खेल ज्यादा निष्पक्ष हो सके। इसकी शुरुआत 2008 में हुई थी और अब ये लगभग सभी अंतरराष्ट्रीय मैचों में इस्तेमाल होता है। टेस्ट मैच की हर पारी में एक टीम को तीन रिव्यू मिलते हैं।

 

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