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बलाई डे – पाकिस्तान से भारत तक का सफर, फुटबॉल का ‘फ्लाइंग बर्ड’

सोचिए, अगर आज के समय में विराट कोहली अचानक अपना देश छोड़कर इंग्लैंड जाकर बस जाएं और वहीं से खेलना शुरू कर दें, तो क्या होगा? या फिर एमएस धोनी अपने करियर के सुनहरे दौर में ही किसी दूसरे देश के लिए खेलने लगें। यकीन मानिए, लाखों फैंस सदमे में चले जाएंगे, सोशल मीडिया पर बवाल मच जाएगा और यह भारत के खेल इतिहास के लिए बड़ी चोट साबित होगी।

ऐसा ही एक चौंकाने वाला किस्सा 1965 में पाकिस्तान के साथ हुआ था। उस समय पाकिस्तान के अखबारों के पोस्टर बॉय बने एक फुटबॉल खिलाड़ी ने अचानक भारत आकर बसने का फैसला कर लिया। मैदान में उनका जलवा ऐसा था कि विपक्षी टीम के खिलाड़ी भी उनका नाम सुनकर सतर्क हो जाते थे। गोलपोस्ट के आगे खड़े होकर वह मैच का पासा पलट देते थे, बिल्कुल धोनी की तरह। पाकिस्तान की मीडिया उन्हें प्यार से “फ्लाइंग बर्ड” कहती थी।

भारत और पाकिस्तान, दोनों के लिए खेलने वाला अकेला खिलाड़ी 15 अगस्त 2025 जैसे खास दिन पर, यह कहानी और भी अहम हो जाती है, क्योंकि बलाई डे भारत और पाकिस्तान, दोनों के लिए इंटरनेशनल फुटबॉल खेलने वाले अकेले खिलाड़ी हैं। उनका सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं—एक देश के लिए खेलना, फिर उसी देश को छोड़कर दूसरे देश में आकर नई पहचान बनाना।

कहानी शुरू होती है 1947 से। 14 अगस्त की रात 12 बजे जैसे ही घड़ी ने तारीख बदली, भारतीय उपमहाद्वीप का नक्शा बदल गया। पाकिस्तान का जन्म हुआ—दो हिस्सों में—पश्चिम पाकिस्तान (आज का पाकिस्तान) और पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश)।

पूर्वी पाकिस्तान, जहां बंगाल का पूर्वी हिस्सा आता था, भारत से हजारों किलोमीटर दूर था, लेकिन तब भी पाकिस्तान का हिस्सा था। यहीं, आज़ादी से करीब 10 महीने पहले, एक छोटे से कस्बे कोटालिपारा में एक बच्चे का जन्म हुआ। नाम रखा गया—बलाई डे।

बलाई डे बचपन से ही खेलों में तेज थे, लेकिन फुटबॉल उनका असली प्यार था। गोलकीपर के रूप में उनकी प्रतिक्रिया इतनी तेज थी कि गेंद उनके सामने से निकलना मुश्किल था। पाकिस्तान के अखबार उन्हें “फ्लाइंग बर्ड” कहते थे, क्योंकि वह हवा में उछलकर गेंद को ऐसे पकड़ते जैसे कोई पक्षी अपने शिकार को पकड़ रहा हो। 1960 के दशक में वह पाकिस्तान के टॉप फुटबॉलर्स में शामिल हो गए और नेशनल टीम में खेलते हुए कई अहम मैच जिताए।

लेकिन किस्मत का खेल देखिए—1965 में बलाई डे ने पाकिस्तान छोड़ने का फैसला किया। उस दौर में यह सिर्फ खेल का नहीं, बल्कि राजनीति और भावनाओं से जुड़ा बड़ा कदम था। भारत आने के बाद शुरुआती दिनों में उन्हें संघर्ष करना पड़ा। नए माहौल, नई टीम और अलग सिस्टम में खुद को साबित करना आसान नहीं था।

धीरे-धीरे बलाई डे ने भारत में अपनी पहचान बनाई। उनकी गोलकीपिंग का जादू यहां भी छा गया। उन्होंने भारत के लिए इंटरनेशनल मैच खेले और कई यादगार जीत में अहम भूमिका निभाई। इस तरह, बलाई डे दोनों देशों के लिए खेलने वाले इकलौते खिलाड़ी बन गए—एक ऐसा रिकॉर्ड, जो शायद ही कभी टूट पाए।

बलाई डे की कहानी सिर्फ खेल की नहीं है, बल्कि यह दो देशों के बीच बंटवारे, रिश्तों और एक खिलाड़ी की हिम्मत की कहानी है। उन्होंने साबित किया कि खेल की असली पहचान सीमाओं से नहीं, बल्कि हुनर और जज़्बे से होती है।

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