वियना: अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की एक हालिया रिपोर्ट ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने इतना संवर्धित यूरेनियम जमा कर लिया है जो एक परमाणु बम बनाने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है। यह ख़ुलासा ऐसे वक्त में हुआ है जब अमेरिका और ईरान के बीच नए परमाणु समझौते को लेकर बातचीत चल रही है।
☢️ 60% संवर्धित यूरेनियम का भंडार बढ़ा
17 मई 2025 तक ईरान ने 408.6 किलोग्राम यूरेनियम को 60% शुद्धता तक संवर्धित कर लिया है। यह स्तर हथियार-योग्य यूरेनियम (90%) के बेहद करीब है। फरवरी 2025 की पिछली रिपोर्ट में यह आंकड़ा 274.8 किलोग्राम था, यानी दो महीने में 133.8 किलोग्राम की बढ़ोतरी हुई है।
⚠️ IAEA की चेतावनी: तत्काल सहयोग जरूरी
IAEA के महानिदेशक राफाएल ग्रोसी ने एक बार फिर ईरान से सहयोग की अपील करते हुए कहा है,
“ईरान वह अकेला गैर-परमाणु हथियार संपन्न देश है जो इस स्तर का यूरेनियम संवर्धन कर रहा है। हम चाहते हैं कि तेहरान पूरी पारदर्शिता के साथ हमारी निगरानी प्रक्रिया में सहयोग करे।”
ग्रोसी ने यह भी दोहराया कि इस संवर्धन के चलते मिडिल ईस्ट क्षेत्र में अस्थिरता और युद्ध का खतरा बढ़ सकता है।
🇺🇸 अमेरिका-ईरान परमाणु वार्ता पर पड़ सकता है असर
यह रिपोर्ट उस समय आई है जब अमेरिका, विशेष रूप से पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, ईरान के साथ एक नए परमाणु समझौते की कोशिश में लगे हैं। हालांकि, ईरानी अधिकारियों ने फिलहाल किसी भी तात्कालिक समझौते की संभावना से इनकार कर दिया है।
🇮🇷 तेहरान का जवाब: बिना शर्त नहीं होगा कोई समझौता
ईरान ने IAEA की चेतावनियों को खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि:
“हम किसी समझौते के लिए तभी तैयार होंगे, जब हम पर लगाए गए सभी प्रतिबंध हटाए जाएं और हमारे परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की स्वतंत्रता दी जाए।”
🇮🇱 इज़राइल की भूमिका और ट्रंप की अपील
डोनाल्ड ट्रंप ने हाल में यह खुलासा किया था कि उन्होंने इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से अनुरोध किया है कि वे ईरान पर सैन्य कार्रवाई करने से फिलहाल परहेज़ करें, ताकि अमेरिका को परमाणु वार्ता के लिए और समय मिल सके।
🔍 निष्कर्ष
IAEA की रिपोर्ट ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ईरान शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के बहाने हथियार निर्माण की दिशा में बढ़ रहा है? बढ़ते यूरेनियम भंडार और वार्ता में गतिरोध के बीच यह मसला केवल पश्चिम एशिया ही नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती बन सकता है।
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