भारत-पाकिस्तान के बीच जारी तनाव के बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का हालिया बयान विवादों में आ गया है। शरीफ ने अपने राष्ट्रीय संबोधन में संघर्ष के इस दौर में चीन, तुर्किए, अमेरिका और अन्य देशों से मिले समर्थन का ज़िक्र करते हुए उन सभी को धन्यवाद कहा। लेकिन इस बयान ने सोशल मीडिया पर उन्हें कटघरे में खड़ा कर दिया।
वैश्विक नेताओं को किया धन्यवाद, सोशल मीडिया पर ट्रोल
शनिवार को दिए गए अपने संबोधन में शहबाज शरीफ ने अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, सऊदी क्राउन प्रिंस, कतर के अमीर और तुर्की के राष्ट्रपति का नाम लेते हुए कहा कि इन सभी नेताओं ने पाकिस्तान को नैतिक और कूटनीतिक समर्थन दिया। उन्होंने दावा किया कि पाकिस्तान इन सहयोगों को कभी नहीं भूलेगा।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पाकिस्तानी सोशल मीडिया यूजर्स ने भारत के खिलाफ कई झूठे दावे फैलाए। इसी बात को लेकर सोशल मीडिया यूजर्स ने उन्हीं पर निशाना साधा और उनके बयान का मज़ाक उड़ाया।
चीन को बताया ‘विश्वसनीय मित्र’
शरीफ ने चीन के साथ संबंधों को लेकर भी गर्मजोशी दिखाई। उन्होंने चीन को “प्यारा और भरोसेमंद मित्र” करार देते हुए कहा कि चीन ने हर संकट की घड़ी में पाकिस्तान का साथ दिया है और यही वजह है कि पाकिस्तान उसके सहयोग को विशेष महत्व देता है।
इस दौरान चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने भी पाकिस्तान के प्रति समर्थन जताया और भारत-पाक तनाव को कम करने में रचनात्मक भूमिका निभाने की बात दोहराई।
सिंधु जल समझौते और कश्मीर मुद्दे पर नरम रुख
अपने भाषण में शहबाज शरीफ ने सिंधु जल समझौते और कश्मीर से जुड़े मुद्दों पर भी बात की। उन्होंने उम्मीद जताई कि बातचीत और कूटनीति के ज़रिए इन जटिल मसलों का हल निकाला जा सकता है। यह पाकिस्तान की ओर से रिश्तों को सुधारने का एक नरम संकेत माना जा रहा है।
भारत का कड़ा रुख: सीजफायर उल्लंघन पर सख्त चेतावनी
भारत ने पाकिस्तान की गतिविधियों पर सख्त प्रतिक्रिया दी है। विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने सीजफायर के कुछ ही घंटों बाद हुई गोलीबारी पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में चेतावनी देते हुए कहा कि भारतीय सेनाओं को किसी भी भविष्य के उल्लंघन पर सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
अमेरिका की मध्यस्थता पर भ्रम
सीजफायर को लेकर अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया कि उनकी मध्यस्थता से यह सहमति बनी है। हालांकि, भारत सरकार ने तुरंत इस बात का खंडन करते हुए स्पष्ट किया कि यह फैसला भारत और पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों—डीजीएमओ स्तर पर—सीधे संवाद का नतीजा था, जिसमें किसी तीसरे पक्ष की भूमिका नहीं रही।
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