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हर साल 29 जुलाई को इंटरनेशनल टाइगर डे मनाया जाता है। इसका मकसद लोगों को बाघों की घटती संख्या और उनकी सुरक्षा को लेकर जागरूक करना है। भारत में बाघ को राष्ट्रीय पशु का दर्जा मिला है और यहां दुनिया के सबसे ज्यादा बाघ रहते हैं। इसलिए उनकी सुरक्षा और संरक्षण हमारे लिए बहुत जरूरी है।
🐅 बाघ की मौत पर दफन नहीं, जलाया क्यों जाता है?
जब किसी इंसान की मौत होती है तो उसका अंतिम संस्कार किया जाता है, उसी तरह बाघ की मौत पर भी उसका दाह संस्कार किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बाघ को दफनाने के बजाय जलाया क्यों जाता है?
इसका जवाब है – तस्करी को रोकना।
🔍 2004 की एक घटना ने बदल दिए नियम
साल 2004 से पहले बाघों को दफनाया जाता था। लेकिन उसी साल राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्व में एक बाघ की हत्या कर दी गई। बाद में तस्करों ने उस बाघ को कब्र से निकालकर उसकी हड्डियां और अंग चुरा लिए। ये अंग अंतरराष्ट्रीय बाजार में बहुत महंगे बिकते हैं।
इस घटना के बाद नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) ने सख्त फैसला लिया कि अब से हर मरे हुए बाघ का पूरी तरह जलाकर अंतिम संस्कार किया जाएगा, ताकि तस्करी न हो सके।
🔥 कैसे होता है बाघ का अंतिम संस्कार?
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बाघ की मौत के बाद NTCA की एक टीम मौके पर पहुंचती है।
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इसमें वन विभाग, पुलिस, प्रशासन और NTCA के अधिकारी शामिल होते हैं।
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बाघ के शव का पूरी तरह से दाह संस्कार किया जाता है और देखा जाता है कि कोई हिस्सा बच न जाए, जिसे तस्कर इस्तेमाल कर सकें।
📌 निष्कर्ष
बाघों की सुरक्षा के लिए सिर्फ जंगल में ही नहीं, उनकी मौत के बाद भी सख्ती बरती जाती है। उनका अंतिम संस्कार एक तरह से तस्करों को रोकने का तरीका है। World Tiger Day पर हमें ये समझना चाहिए कि बाघों की हिफाजत सिर्फ सरकार नहीं, हम सभी की जिम्मेदारी है।
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