वाशिंगटन: अमेरिका और चीन के बीच तनावपूर्ण रिश्तों की नई कड़ी अब शिक्षा क्षेत्र में देखने को मिल रही है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका कुछ चीनी छात्रों के वीजा रद्द करने की प्रक्रिया शुरू करने जा रहा है। इस फैसले से अमेरिका में पढ़ रहे हजारों चीनी छात्रों के भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं।
किसे किया जाएगा निशाना?
रूबियो के अनुसार, यह कदम उन छात्रों पर केंद्रित होगा जो या तो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से किसी प्रकार के जुड़ाव में हैं या फिर अमेरिका में किसी संवेदनशील या रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण विषय की पढ़ाई कर रहे हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर यह घोषणा करते हुए कहा कि यह निर्णय राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
अमेरिका में दूसरा सबसे बड़ा विदेशी छात्र समूह
चीनी छात्र अमेरिका में दूसरे सबसे बड़े विदेशी छात्र समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं। अकेले 2023-2024 शैक्षणिक सत्र में इनकी संख्या 2.7 लाख से अधिक रही है, जो कुल अंतरराष्ट्रीय छात्रों का लगभग 25% है। ऐसे में इस कदम का असर न केवल छात्रों पर, बल्कि अमेरिकी शैक्षणिक संस्थानों पर भी पड़ सकता है।
वीजा साक्षात्कार और समीक्षा पर विराम
रूबियो ने मंगलवार को विदेशी छात्रों के लिए नई वीजा साक्षात्कार प्रक्रिया को फिलहाल रोक दिया है, ताकि उनके सोशल मीडिया व्यवहार और पृष्ठभूमि की गहन जांच की जा सके। इससे हजारों विदेशी छात्रों में असुरक्षा और भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है।
छात्रों में बढ़ रही चिंता
व्लादिस्लाव प्लायाका, जो विस्कॉन्सिन-ओशकोश विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं, अपनी माँ से मिलने पोलैंड जाने की योजना बना रहे थे, लेकिन अब उन्हें नहीं मालूम कि उनका वीजा नवीनीकरण कब संभव होगा। उन्होंने कहा, “फिलहाल सिस्टम पर मेरा भरोसा कमजोर हुआ है।”
विदेशी छात्रों पर ट्रंप प्रशासन की पुरानी सख्ती
यह मुद्दा नया नहीं है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में भी हार्वर्ड विश्वविद्यालय में विदेशी छात्रों के नामांकन पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की गई थी, जिसे अदालत ने रोका था। ट्रंप का मानना था कि विदेशी छात्रों की संख्या को सीमित करना जरूरी है ताकि अमेरिकी छात्रों को अधिक अवसर मिल सकें।
निष्कर्ष: शिक्षा के माध्यम से भी सख्ती
इस निर्णय को अमेरिका की चीन के प्रति आक्रामक कूटनीति के अगले चरण के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह नीति पूरी तरह लागू होती है, तो यह अमेरिका के उच्च शिक्षा संस्थानों, अंतरराष्ट्रीय छात्र-नीति, और वैश्विक शिक्षा साझेदारी पर गहरा असर डाल सकती है।
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