वॉशिंगटन डीसी – अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के विदेशी छात्रों पर प्रतिबंध लगाने के बाद अब अन्य विश्वविद्यालयों के लिए भी खतरे की घंटी बजती दिख रही है। ट्रंप प्रशासन के इस कदम से न केवल छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है, बल्कि अमेरिकी उच्च शिक्षा प्रणाली पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
हार्वर्ड पर क्यों गिरी गाज?
‘स्टूडेंट एंड एक्सचेंज विज़िटर प्रोग्राम’ (SEVP) की मान्यता को रद्द कर ट्रंप सरकार ने हार्वर्ड को विदेशी छात्रों के नए दाखिलों से रोक दिया। इस कदम की बड़ी वजह विश्वविद्यालय पर लगे गंभीर आरोप बताए जा रहे हैं, जिनमें यहूदी-विरोधी वातावरण को बढ़ावा देना, विरोध प्रदर्शनों को अनदेखा करना, और चीन के साथ संदिग्ध संबंध शामिल हैं।
होमलैंड सिक्योरिटी सेक्रेटरी क्रिस्टी नोएम ने आरोप लगाया कि हार्वर्ड ने सरकार की मांगों को अनदेखा किया और विदेशी छात्रों से जुड़े जरूरी दस्तावेज समय पर नहीं सौंपे। इतना ही नहीं, डाइवर्सिटी, इक्विटी और इनक्लूजन (DEI) कार्यक्रमों को भी ट्रंप प्रशासन ने पक्षपातपूर्ण बताते हुए आलोचना की।
विदेशी छात्रों के लिए झटका
ट्रंप सरकार के इस फैसले से करीब 6,800 विदेशी छात्र प्रभावित होंगे, जो हार्वर्ड के कुल छात्र समुदाय का लगभग 27% हैं। ये छात्र भारत, चीन, दक्षिण कोरिया, कनाडा और ब्रिटेन जैसे देशों से आते हैं।
प्रभाव के मुख्य बिंदु:
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2025-26 शैक्षणिक सत्र के लिए हार्वर्ड अब नए अंतरराष्ट्रीय छात्रों को दाखिला नहीं दे सकेगा।
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पहले से F-1 या J-1 वीज़ा पर पढ़ रहे छात्रों को अन्य विश्वविद्यालयों में स्थानांतरित होना पड़ेगा या अमेरिका छोड़ना पड़ेगा।
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हाल ही में ग्रेजुएशन करने वाले छात्रों को काम और वीज़ा स्थिति में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
हार्वर्ड ने दी कानूनी चुनौती
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने इस आदेश को “राजनीतिक प्रतिशोध” और “संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन” बताते हुए बोस्टन की संघीय अदालत में मुकदमा दर्ज किया है। अदालत ने फिलहाल ट्रंप प्रशासन के आदेश पर अस्थायी रोक लगा दी है। अगली सुनवाई मंगलवार को तय की गई है।
हार्वर्ड के अध्यक्ष एलन गार्बर ने कहा, “हम अपने अंतरराष्ट्रीय छात्रों के साथ खड़े हैं। वे हमारी अकादमिक और सांस्कृतिक समृद्धि के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।”
क्या दूसरे विश्वविद्यालय भी निशाने पर हैं?
डोनाल्ड ट्रंप ने यह संकेत दिया है कि अन्य विश्वविद्यालयों, विशेष रूप से वे जो सरकार की नीतियों पर असहमति जताते हैं, को भी ऐसी कार्रवाइयों का सामना करना पड़ सकता है। पहले भी ट्रंप प्रशासन ने कोलंबिया, ब्राउन और प्रिंसटन जैसी संस्थाओं की फंडिंग रोक दी थी।
संकेत हैं कि वे विश्वविद्यालय जो प्रो-पैलेस्टाइन प्रदर्शनों की अनुमति देते हैं या DEI जैसे कार्यक्रमों को बनाए रखते हैं, भविष्य में सरकार की सख्ती का शिकार हो सकते हैं।
इस फैसले का व्यापक असर क्या होगा?
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आर्थिक झटका – अंतरराष्ट्रीय छात्र भारी ट्यूशन फीस देते हैं, जिससे विश्वविद्यालय की आय पर असर पड़ना तय है।
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शैक्षणिक नुकसान – विदेशी छात्र रिसर्च और ग्लोबल एजुकेशन मिशन का अहम हिस्सा हैं, जिनकी अनुपस्थिति से हार्वर्ड की प्रतिष्ठा प्रभावित हो सकती है।
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छात्रों का करियर अधर में – छात्रों के लिए सत्र शुरू होने से पहले यूनिवर्सिटी बदलना न केवल मुश्किल है, बल्कि कई के लिए अमेरिका छोड़ना भी एकमात्र विकल्प बन सकता है।
आगे की राह
हार्वर्ड का रुख स्पष्ट है—वह अपने छात्रों के अधिकारों के लिए कानूनी लड़ाई जारी रखेगा। दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन इस फैसले को ‘कानून सम्मत और जरूरी’ बताकर इसे सही ठहरा रहा है। यह मामला अब न सिर्फ एक यूनिवर्सिटी, बल्कि अमेरिका की पूरी उच्च शिक्षा प्रणाली की स्वतंत्रता और संरचना के लिए अहम मोड़ बन चुका है।
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