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अमेरिकी हमलों पर ईरान का कड़ा ऐतराज़: परमाणु ऊर्जा संगठन ने जताई नाराज़गी, IAEA पर भी उठे सवाल

📍 तेहरान | 22 जून 2025

ईरान के परमाणु ऊर्जा संगठन (AEOI) ने अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की कड़ी आलोचना करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय संधियों और वैज्ञानिक स्वतंत्रता के खिलाफ बताया है। अमेरिका द्वारा किए गए हमलों में ईरान के तीन प्रमुख परमाणु ठिकाने निशाना बने, जिसके बाद तेहरान में राजनीतिक और वैज्ञानिक हलकों में गहरी नाराज़गी देखी जा रही है।


“हम डरने वाले नहीं हैं”: AEOI का बयान

ईरान के परमाणु ऊर्जा संगठन ने एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा:

“इन दुर्भावनापूर्ण हमलों के बावजूद, हमारे वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ राष्ट्र के परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

बयान में ज़ोर दिया गया कि यह हमला केवल ईरान की संप्रभुता पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण परमाणु विकास के अधिकार पर भी आघात है।


IAEA की चुप्पी पर नाराज़गी

AEOI ने इस पूरे घटनाक्रम पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की भूमिका पर भी सवाल उठाए और कहा:

“IAEA का रवैया बेहद निराशाजनक रहा है। उसकी चुप्पी इस हमले में अप्रत्यक्ष मिलीभगत का संकेत देती है।”

संगठन ने आरोप लगाया कि जिस एजेंसी को परमाणु स्थलों की सुरक्षा और निरीक्षण का ज़िम्मा सौंपा गया है, वही इस आपात स्थिति में ‘उदासीन दर्शक’ बनकर रह गई।


“क़ानूनी कार्रवाई होगी”

परमाणु ऊर्जा संगठन ने संकेत दिए हैं कि वह इस हमले के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहा है। उनके अनुसार:

“हम आवश्यक क़दम उठाएंगे, जिनमें अंतरराष्ट्रीय न्यायिक मंचों पर अपील करना भी शामिल होगा।”


वैश्विक समर्थन की अपील

AEOI ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आग्रह किया कि वे “इस अनुचित और आक्रामक सैन्य कार्रवाई की खुलकर निंदा करें” और ईरान के शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम के समर्थन में खड़े हों।


पृष्ठभूमि: हमले और प्रतिक्रिया

पिछले 24 घंटों में अमेरिका ने ईरान के जिन तीन परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया, उनमें से एक फ़ोर्दो स्थित सुविधा भी शामिल है, जो भूमिगत और अत्यधिक संरक्षित मानी जाती है। ईरान का दावा है कि “हमले से परमाणु सामग्री को कोई गंभीर नुक़सान नहीं हुआ”, क्योंकि उसे पहले ही स्थानांतरित कर दिया गया था।


निष्कर्ष: आगे क्या होगा?

AEOI का तीखा बयान संकेत देता है कि ईरान अब इस मुद्दे को सिर्फ़ सैन्य या रणनीतिक दायरे में नहीं देख रहा, बल्कि इसे वैज्ञानिक प्रतिष्ठा और वैश्विक असमानता के रूप में पेश कर रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा वियना में IAEA की आपात बैठक और संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद तक पहुँच सकता है।

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