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गाज़ा: धरती पर नरक जैसी स्थिति — क्या अब भी चुप रहेगा विश्व?

आज गाज़ा पट्टी का हाल ऐसा है कि रेड क्रॉस ने इसे “धरती पर नरक” करार दिया है। पिछले 19 महीनों में इस छोटे से क्षेत्र में 52,000 से अधिक फिलिस्तीनियों की जान जा चुकी है — जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। तकरीबन 2.3 मिलियन की पूरी आबादी विस्थापित हो चुकी है, और अधिकांश को कई बार अपने घर छोड़ने पड़े हैं।

गाज़ा में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहद बदतर है, और इस पर इज़राइल द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों और घेराबंदी ने भोजन की किल्लत को और गहरा कर दिया है। अब हालात ऐसे हैं कि संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार शाखा तक चेतावनी दे चुकी है कि यदि स्थिति ऐसी ही रही तो गाज़ा में इंसानों का जीवन मुश्किल ही नहीं, असंभव हो जाएगा।

फिर से हमले की तैयारी में इज़राइल

इज़राइल की बेंजामिन नेतन्याहू सरकार ने अब और अधिक आरक्षित सैनिकों को बुलाकर ज़मीनी अभियान तेज़ करने की योजना बनाई है। इस योजना के तहत इज़राइल न केवल गाज़ा पर सैन्य नियंत्रण स्थापित करना चाहता है, बल्कि राहत सामग्री की आपूर्ति पर भी सीधा नियंत्रण चाहता है।

उत्तर गाज़ा को पहले ही मलबे में तब्दील किया जा चुका है और वहां से लाखों लोगों को जबरन हटाया गया है। अब एक बार फिर नए अभियान के तहत शरणार्थी शिविरों में रह रहे लोगों को फिर से विस्थापित करने की योजना है। इज़राइल का कहना है कि यह सब हमास को कमजोर करने और बंधकों को छुड़ाने के लिए ज़रूरी है, लेकिन इस अभियान में पूरे गाज़ा की नागरिक आबादी को निशाना बनाया जा रहा है।

अंतरराष्ट्रीय चुप्पी और नैतिक विफलता

अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से पश्चिमी शक्तियां, इस पूरे संघर्ष में लगभग मौन हैं। जबकि अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने नेतन्याहू के खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी किया है, फिर भी इज़राइल को सैन्य समर्थन मिलता रहा है। अमेरिका की पिछली और वर्तमान सरकारों — दोनों ने इज़राइल को कूटनीतिक और सैन्य समर्थन देने में कोई कोताही नहीं की।

2025 की संभावित शांति योजना, जिसमें गाज़ा से इज़राइली वापसी और बंधकों की रिहाई की बात थी, अब विफल हो चुकी है। दोनों पक्षों की ज़िद ने संघर्ष को फिर से शुरू कर दिया। यदि इज़राइल आगे भी इसी तरह के सैन्य दबाव की नीति अपनाता रहा, तो यह न केवल एक बड़े मानवीय संकट को जन्म देगा, बल्कि शांति प्रक्रिया की बची-खुची उम्मीदें भी खत्म हो जाएंगी।


निष्कर्ष

अब समय आ गया है कि दुनिया सिर्फ तमाशबीन न बने। जब किसी देश द्वारा इतनी बड़ी संख्या में निर्दोष लोगों को विस्थापित किया जा रहा हो, बच्चों और महिलाओं की जान जा रही हो — तो नैतिक साहस दिखाना और न्याय की आवाज़ उठाना हर राष्ट्र का कर्तव्य है।


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