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गैस संकट का असर गांव तक: लोग फिर लौटे चूल्हे और लकड़ी की ओर

दुनिया में बढ़ते युद्ध का असर अब भारत के गांवों की रसोई तक पहुंच गया है। गैस सिलेंडर की कमी और महंगाई के कारण लोगों की परेशानी बढ़ गई है।

गैस की कमी से बढ़ी परेशानी
गैस बुक करने के बाद भी 25-45 दिन तक सिलेंडर नहीं मिल रहा है। ऐसे में लोग मजबूरी में कंडे (उपले) और लकड़ी का इस्तेमाल करने लगे हैं।

गांवों में बढ़ी लकड़ी और कंडों की मांग
अब शहरों के लोग भी गांवों में ईंधन लेने पहुंच रहे हैं। महिलाएं सुबह-सुबह गोबर इकट्ठा कर कंडे बना रही हैं और लोग जंगल, नदी किनारे से लकड़ी जुटा रहे हैं।

मवेशियों की बढ़ी अहमियत
गोबर की मांग बढ़ने से अब लोग अपने पशुओं को खुला नहीं छोड़ रहे। उन्हें घर पर बांधकर रखा जा रहा है, जिससे सड़कों पर आवारा पशु कम हो गए हैं।

फिर लौट आया मिट्टी का चूल्हा
उज्ज्वला योजना के बाद लोग गैस इस्तेमाल करने लगे थे, लेकिन अब फिर से मिट्टी और लोहे के चूल्हे चलने लगे हैं। कई घरों में ईंटों के चूल्हे बनाकर खाना पकाया जा रहा है।

पुराने तरीके को लोग बता रहे बेहतर
कुछ ग्रामीणों का कहना है कि लकड़ी और कंडे पर बना खाना ज्यादा स्वादिष्ट होता है। कई लोग मजाक में कह रहे हैं कि अब पुराना तरीका ही सही है।

कुल मिलाकर, हालात ऐसे बन गए हैं कि लोग आधुनिक सुविधाएं छोड़कर फिर से पुराने तरीकों की ओर लौटने को मजबूर हो गए हैं।

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