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झूठी जानकारी से और बिगड़ रहा है जलवायु संकट: वैज्ञानिकों ने जताई चिंता

जयपुर। एक नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर फैलाई जा रही झूठी और भ्रामक जानकारी इस संकट को और ज्यादा खतरनाक बना रही है। यह गलत जानकारी अक्सर बड़ी तेल और गैस कंपनियों या कुछ देशों की ओर से फैलाई जाती है, जिससे जलवायु सुधार के जरूरी कदमों में देरी हो रही है।

यह रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय सूचना पर्यावरण पैनल (Ipie) ने तैयार की है, जिसमें 300 से ज्यादा शोधों की समीक्षा की गई है। इसमें कहा गया है कि पहले सिर्फ यह कहा जाता था कि जलवायु परिवर्तन हो ही नहीं रहा, लेकिन अब समाधान जैसे सौर और पवन ऊर्जा को भी बदनाम किया जा रहा है।

रिपोर्ट की मुख्य बातें:

  • हाल ही में स्पेन में बिजली कटौती को लेकर गलत प्रचार हुआ कि इसके लिए नवीकरणीय ऊर्जा जिम्मेदार है।

  • ऑनलाइन ट्रोल और बॉट्स इस तरह की भ्रामक जानकारी को तेजी से फैलाते हैं।

  • राजनेताओं और अफसरों को भी बदनाम कर, जलवायु सुधार की कोशिशों को रोका जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की जलवायु मामलों की प्रतिनिधि एलिसा मोरगेरा ने सुझाव दिया है कि जलवायु को लेकर फैलाई जा रही झूठी जानकारी और “ग्रीनवॉशिंग” (यानि झूठे पर्यावरणीय दावे) को अपराध की श्रेणी में लाया जाए।

ब्राज़ील, जो अगले COP30 जलवायु सम्मेलन की मेज़बानी करेगा, इस मुद्दे पर वैश्विक समर्थन जुटाने की कोशिश में है।

डॉ. क्लाउस जेनसेन (कोपेनहेगन विश्वविद्यालय) का कहना है, “अगर लोगों को सही जानकारी नहीं मिलेगी, तो वे न तो सही नेता चुन पाएंगे और न ही सरकारें सही फैसले ले पाएंगी। हमारे पास उत्सर्जन घटाने के लिए सिर्फ 5 साल बचे हैं।”

मोरगेरा ने यह भी कहा कि देशों को अपनी सूचना प्रणाली को “डी-फॉसिलाइज़” करना चाहिए, यानी तेल-गैस कंपनियों के प्रभाव से मुक्त करना चाहिए।

तेल कंपनियों पर दोहरा धोखा करने का आरोप:
पहले इन्होंने जलवायु परिवर्तन को झूठ कहा, अब ये खुद को पर्यावरण समर्थक दिखा रही हैं।

अन्य क्षेत्र जैसे बिजली, पशुपालन, एयरलाइंस, पर्यटन और फास्ट फूड कंपनियां भी जलवायु से जुड़ी सच्चाई को छिपा रही हैं।

रिपोर्ट में प्रमुख झूठ फैलाने वालों का जिक्र:

  • डोनाल्ड ट्रंप, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति, जिन्होंने जलवायु विज्ञान को “झूठ” कहा।

  • रूसी खुफिया एजेंसियां, जो ऑनलाइन ट्रोल फार्म से झूठी जानकारी फैलाती हैं।

  • यूरोप के दक्षिणपंथी दल जैसे जर्मनी का AfD, स्पेन का Vox और फ्रांस का नेशनल रैली भी जलवायु विज्ञान का विरोध कर रहे हैं।

रिपोर्ट में सुझाए गए समाधान:

  • सोशल मीडिया पर कड़ी निगरानी और नियम, जैसे यूरोप का डिजिटल सर्विसेज एक्ट

  • तेल कंपनियों को अपने असली उत्सर्जन की जानकारी देना अनिवार्य करना

  • जलवायु शिक्षा को बढ़ावा देना ताकि लोग सही और गलत में फर्क कर सकें

हालांकि रिपोर्ट यह भी मानती है कि अब तक ज्यादातर अध्ययन सिर्फ अंग्रेजी में और पश्चिमी देशों तक सीमित रहे हैं। पूरे अफ्रीका पर सिर्फ एक ही स्टडी की गई है।

अगर आप चाहें तो मैं इस रिपोर्ट को न्यूज बुलेटिन या बच्चों के लिए और सरल भाषा में भी तैयार कर सकता हूँ।

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