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डूंगरपुर-बांसवाड़ा नेशनल हाईवे 927ए पर सरकण घाटी के पास एक दुर्लभ पीला पलाश का पेड़ खड़ा है। यह साधारण पेड़ नहीं, बल्कि एक अनोखी प्राकृतिक धरोहर है। जहां आमतौर पर पलाश के फूल लाल होते हैं, वहीं इस पेड़ पर सोने जैसे पीले फूल खिलते हैं।
कभी मिला था संरक्षण
साल 2022 में जब हाईवे चौड़ा करने का काम शुरू हुआ, तब मशीनें इस पेड़ तक पहुंच गई थीं। उस समय स्थानीय लोगों ने अभियान चलाकर इसे कटने से बचाया। इसे “मदर ट्री” घोषित कर संरक्षण दिया गया और इसके पास एक तख्ती भी लगाई गई। तब लगा था कि अब यह पेड़ सुरक्षित रहेगा।
अब फिर खतरे में
आज हालात बदल गए हैं। संरक्षण की तख्ती गायब हो चुकी है। आसपास की पहाड़ियों में हो रहे खनन से निकलने वाली मिट्टी और कंक्रीट पेड़ के तने तक पहुंच गई है। चारों ओर खुदाई होने से इसकी जड़ों को खतरा है। धूल और मलबे के कारण पेड़ का दम घुट रहा है। बारिश में मिट्टी खिसकने से इसके गिरने का डर भी बना हुआ है।
क्या हो सकते हैं उपाय?
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पेड़ के आसपास का क्षेत्र नो-माइनिंग ज़ोन घोषित किया जाए।
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तने के पास जमा मिट्टी और कंक्रीट तुरंत हटाई जाए।
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कटाव रोकने के लिए मजबूत पत्थर की दीवार बनाई जाए।
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जिम्मेदार अधिकारी स्थल का सर्वे कर स्थिति का आकलन करें।
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कृषि वैज्ञानिकों की मदद से इसके बीजों से नए पौधे तैयार किए जाएं।
क्यों खास है पीला पलाश?
डूंगरपुर और बांसवाड़ा सहित प्रदेश के जंगलों में लाल पलाश के पेड़ बहुत मिलते हैं, लेकिन पीले पलाश की संख्या बहुत कम है। डूंगरपुर में ऐसे पेड़ गिनती के ही माने जाते हैं। सरकण घाटी के पास खड़ा यह पेड़ इन दिनों अपने पीले फूलों से दूर से ही लोगों को आकर्षित करता है।
यह सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि वागड़ क्षेत्र की अनमोल विरासत है। अगर इसे समय रहते नहीं बचाया गया, तो प्रकृति का यह दुर्लभ रंग हमेशा के लिए खो सकता है।
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