जहाँ भारत तुर्की के पाकिस्तान-समर्थन वाले रुख को लेकर सख्त नाराज़ है, वहीं इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन की अंतरराष्ट्रीय शांति वार्ता में भूमिका की प्रशंसा की है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत हाल ही में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद तुर्की की विदेश नीति से खासा असंतुष्ट है।
एर्दोआन को शांति पहल के लिए सराहना
तुर्की मीडिया के अनुसार, मेलोनी ने फोन पर एर्दोआन से बात कर रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर उनकी मध्यस्थता की कोशिशों को “महत्वपूर्ण और सराहनीय” बताया। इस्तांबुल में रूस और यूक्रेन के प्रतिनिधियों के बीच वार्ता आयोजित करने की तुर्की की योजना को मेलोनी ने “शांति की दिशा में साहसी कदम” करार दिया।
तुर्की की भूमिका को बताया निर्णायक
मेलोनी ने कहा कि जब हजारों लोग इस जंग में जान गंवा चुके हैं और विश्व समुदाय मूकदर्शक बना हुआ है, ऐसे समय में तुर्की ने वार्ता की संभावनाओं को फिर से जीवित किया है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि “अगर इस संघर्ष का समाधान निकलता है, तो उसमें तुर्की की अहम भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।”
पुतिन-जेलेंस्की के बीच संभावित वार्ता
खबरों के मुताबिक, इस्तांबुल में संभावित शांति वार्ता में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की और संभवतः पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी शामिल हो सकते हैं।
भारत की नाराज़गी: तुर्की की पाकिस्तान-समर्थक नीति
भारत का रुख इस समय तुर्की को लेकर बेहद सख्त है। हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में पाकिस्तान समर्थित आतंकियों के हमले के बाद भारत ने कड़ी कार्रवाई करते हुए पीओके में आतंकवादी ठिकानों पर हमला बोला। तुर्की ने इस पर पाकिस्तान का पक्ष लेते हुए ड्रोन और सैन्य उपकरणों की पेशकश कर दी, जिससे भारत में रोष और बढ़ गया।
तुर्की पर आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप
तुर्की पर लंबे समय से हमास, सीरिया, लीबिया, और पाकिस्तान समर्थित आतंकियों को समर्थन देने के आरोप लगते रहे हैं। तुर्की की यह दोहरी भूमिका – एक तरफ शांति की पहल और दूसरी तरफ आतंक समर्थकों से मेलजोल – वैश्विक राजनीति में विरोधाभास पैदा कर रही है।
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