बैंकॉक: एक लीक हुई 17 मिनट की फोन कॉल ने थाईलैंड की राजनीति को हिला कर रख दिया है। प्रधानमंत्री पैटोंगटार्न शिनावात्रा और कंबोडिया के पूर्व प्रधानमंत्री हुन सेन के बीच हुई इस बातचीत ने ऐसा बवंडर खड़ा कर दिया है कि राजधानी की सड़कों पर प्रदर्शन हो रहे हैं, गठबंधन सरकार टूट चुकी है, और सैन्य तख्तापलट की आशंका ज़ोर पकड़ने लगी है।
📞 “अंकल” कहने से बिगड़ा मामला
लीक ऑडियो में प्रधानमंत्री पैटोंगटार्न ने हुन सेन को “अंकल” कहकर संबोधित किया। यह सामान्य शिष्टाचार भले ही हो, लेकिन थाई राष्ट्रवादी समूहों और विपक्ष ने इसे राष्ट्रीय स्वाभिमान के खिलाफ बताया। सबसे बड़ा विवाद तब पैदा हुआ जब उन्होंने थाई सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी को “विरोधी” कहा—वह अधिकारी उस सीमा क्षेत्र की जिम्मेदारी संभाल रहा था जहां हाल ही में गोलीबारी हुई थी।
⚔️ सेना हुई नाराज़, राजनीतिक संतुलन डगमगाया
थाईलैंड की सेना, जिसका देश की राजनीति पर दशकों से गहरा असर रहा है, इस बयान से असहज हो गई है। सेना को “विरोधी” कहे जाने से उनके भीतर असंतोष की लहर फैल गई है। इसी बीच, हुन सेन ने बातचीत की रिकॉर्डिंग न केवल कंबोडियाई अधिकारियों के साथ साझा की, बल्कि सार्वजनिक रूप से फेसबुक पर भी पोस्ट कर दी। यह कदम दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव को और बढ़ा गया है।
🤝 गठबंधन में दरार: भूमजयथाई पार्टी ने छोड़ा साथ
प्रधानमंत्री पैटोंगटार्न को उस समय बड़ा झटका लगा, जब उनकी सहयोगी भूमजयथाई पार्टी, जो संसद में दूसरी सबसे बड़ी ताकत है, ने गठबंधन से बाहर निकलने की घोषणा कर दी। इससे उनकी सरकार का बहुमत खतरे में आ गया है।
विपक्षी नेता नट्टाफोंग रुएंगपन्यावुट ने संसद को भंग करने और नए चुनाव कराने की मांग करते हुए कहा, “प्रधानमंत्री ने देशहित से समझौता किया है, और अब उन्हें पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।”
🌍 सीमा विवाद बना संकट की जड़
थाईलैंड और कंबोडिया के बीच 817 किलोमीटर लंबी सीमा का एक बड़ा हिस्सा विवादित है। दोनों देशों के बीच तनाव का मुख्य कारण 11वीं सदी का एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, जिसे 1962 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने कंबोडिया का हिस्सा माना था। इसके आस-पास का करीब 4.6 वर्ग किमी इलाका अब भी विवाद का केंद्र बना हुआ है। हाल ही में इसी क्षेत्र में झड़प के चलते दोनों देशों के बीच फिर तनाव बढ़ा।
🚨 क्या होगा अगला कदम?
स्थिति तेजी से बिगड़ रही है। प्रदर्शनकारी सड़कों पर हैं, सेना नाराज़ है, और सरकार का बहुमत डगमगा गया है। अब देखना यह है कि क्या पैटोंगटार्न इस संकट को राजनीतिक समझदारी से संभाल पाएंगी, या देश एक और राजनीतिक उथल-पुथल की ओर बढ़ रहा है।
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