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फव्वारे बने सिर्फ दिखावा, गर्मी में नहीं दे पा रहे राहत

राजसमंद शहर में झुलसाती गर्मी
राजसमंद शहर में पिछले दो महीनों से पारा 40 डिग्री से नीचे नहीं गया है। ऐसे में लोगों को राहत की उम्मीद नगर परिषद द्वारा लगाए गए फव्वारों से थी, लेकिन ये फव्वारे अब सिर्फ नाम के रह गए हैं। लगभग 70 लाख रुपये खर्च कर बनाए गए ये फव्वारे अब शो पीस बनकर रह गए हैं, जिनसे न तो ठंडक मिल रही है और न ही कोई राहत।


कई जगहों के फव्वारों की हालत खराब

  1. पं. दीनदयाल उपाध्याय सर्कल (राजनगर)
    फव्वारा सही हालत में है, लेकिन उसे चलाने वाला कोई नहीं है। पानी की भी व्यवस्था नहीं की गई है।

  2. मुखर्जी चौराहा (कांकरोली)
    देखने में तो अच्छा है, लेकिन बहुत समय से नहीं चला।

  3. महात्मा भूरीबाई सर्कल
    फव्वारे की दीवार टूटी हुई है और लाइटिंग भी खराब है।


झील के फव्वारों की दुर्दशा

राजसमंद झील के पास बने फव्वारे कभी लोगों के पसंदीदा थे, लेकिन कोरोना काल में इनमें लगी केबलें चुरा ली गईं। दो साल बीतने के बाद भी मरम्मत नहीं की गई है। लोग कई बार शिकायत कर चुके हैं, लेकिन नगर परिषद ने कोई ध्यान नहीं दिया।


नाम के फव्वारे, काम में नहीं

तीन प्रमुख चौराहों पर भामाशाहों की मदद से फव्वारे लगाए गए थे:

  • दीनदयाल उपाध्याय सर्कल (आरके मार्बल द्वारा)

  • मुखर्जी चौराहा (जेके टायर फैक्ट्री द्वारा)

  • महात्मा भूरीबाई सर्कल

इनमें से कोई भी फव्वारा चालू हालत में नहीं है। ये सभी सिर्फ देखने भर को रह गए हैं।


सिर्फ दिखावा या असली विकास?

नगर परिषद ने सौंदर्यीकरण के नाम पर अब तक 1 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए हैं। इनमें पेंटिंग, लाइटिंग, गार्डनिंग और फव्वारे शामिल हैं। लेकिन गर्मी के इस कठिन समय में एक भी फव्वारा चालू नहीं है


जवाबदेही का अभाव

जब अधिकारियों से पूछा जाता है तो उनका जवाब होता है:

  • “प्रक्रिया में है”

  • “बजट का इंतजार है”

  • “कंपनी से बात चल रही है”

जनता अब इन बहानों से तंग आ चुकी है।


नागरिकों की नाराजगी

स्थानीय लोगों का कहना है कि फव्वारे सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए लगाए गए हैं। एक निवासी ने कहा, “पहले जब झील के पास फव्वारे चलते थे तो पूरा माहौल ठंडा हो जाता था, अब तो बस लोहे का ढांचा रह गया है।”


कमिश्नर से संपर्क नहीं हो पाया

आयुक्त बृजेश रॉय से बात करने की कोशिश की गई लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया।


जरूरी सवाल जो अब उठ रहे हैं

  • क्या इन फव्वारों की देखरेख के लिए कोई बजट तय किया गया है?

  • जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

  • भामाशाहों की मदद से बने फव्वारों की जिम्मेदारी परिषद ने क्यों नहीं ली?

  • क्या इन फव्वारों की स्थिति कभी जांची भी गई?

निष्कर्ष:
राजसमंद के फव्वारे अब राहत के बजाय उपेक्षा और लापरवाही का प्रतीक बन गए हैं। जनता उम्मीद लगाए बैठी है कि कभी तो ये फव्वारे चलेंगे और गर्मी में कुछ सुकून देंगे।

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