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बर्ड एस्टिमेशन से खुला राज: एमपी के जलाशय अब परिंदों की लाइफलाइन बने

मध्य प्रदेश के जलाशय अब सिर्फ पानी का स्रोत नहीं रहे। हाल ही में हुए बर्ड एस्टिमेशन 2026 ने दिखाया है कि ये जलस्रोत अब परिंदों के लिए सुरक्षित और पसंदीदा ठिकाने बनते जा रहे हैं। इस सर्वे ने बर्ड लवर्स को खासा उत्साहित किया है।

जबलपुर पहले, भोपाल दूसरे नंबर पर

एस्टिमेशन के अनुसार, इस बार जबलपुर के मोहरी पांड में सबसे ज्यादा जलपक्षी दर्ज किए गए। वहीं भोपाल का भोज वेटलैंड दूसरे स्थान पर रहा। यह संकेत है कि शहरों के आसपास के जलाशय भी जैव विविधता के लिए उतने ही जरूरी हैं, जितने जंगलों के भीतर के जलस्रोत।

प्रजातियों की विविधता में बिशनखेड़ी आगे

कुल संख्या में भोज वेटलैंड दूसरे नंबर पर रहा, लेकिन बिशनखेड़ी क्षेत्र में सबसे ज्यादा विविधता देखने को मिली। यहां 129 अलग-अलग प्रजातियों के जलपक्षी दर्ज किए गए। इससे साफ है कि पक्षियों के लिए सिर्फ पानी होना नहीं, बल्कि सुरक्षित और अनुकूल माहौल भी जरूरी है।

विदेशी मेहमानों की बढ़ती मौजूदगी

इस बार के एस्टिमेशन में देशी पक्षियों के साथ-साथ प्रवासी पक्षी भी बड़ी संख्या में दिखे। साइबेरिया और यूरोप से आने वाले पक्षियों की मौजूदगी बताती है कि एमपी के वेटलैंड्स अब अंतरराष्ट्रीय माइग्रेशन रूट पर भी अपनी पहचान बना रहे हैं।

शहरों के जलाशय भी बन सकते हैं जंगलों का विकल्प

आंकड़े बताते हैं कि अगर शहरी इलाकों में मौजूद झीलें और डेम सुरक्षित रहें, तो वे पक्षियों के लिए बड़े जंगलों का विकल्प बन सकते हैं। खासकर भोपाल के कलियासोत, हलाली और भोजताल जैसे जलाशय, जो शहरी दबाव झेल रहे हैं।

संरक्षण जरूरी, नहीं तो तस्वीर बदल जाएगी

वेटलैंड विशेषज्ञों का कहना है कि पक्षियों की बढ़ती संख्या एक चेतावनी भी है। अगर अतिक्रमण, गंदगी और अनियंत्रित गतिविधियां बढ़ीं, तो यह स्थिति जल्दी बिगड़ सकती है। बर्ड एस्टिमेशन साफ बताता है कि जलाशयों की सेहत ठीक रहेगी, तभी जैव विविधता भी सुरक्षित रहेगी

कुल मिलाकर, एमपी के जलाशय अब परिंदों के लिए सिर्फ ठहरने की जगह नहीं, बल्कि उनकी लाइफलाइन बनते जा रहे हैं।

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