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बांग्लादेश में यूनुस सरकार के खिलाफ उबाल, शिक्षकों की राष्ट्रव्यापी हड़ताल से बिगड़े हालात

ढाका: बांग्लादेश में अंतरिम प्रधानमंत्री मोहम्मद यूनुस की सरकार चौतरफा दबाव में है। पहले सरकारी कर्मचारियों का प्रदर्शन और अब देशभर के शिक्षकों की अनिश्चितकालीन हड़ताल ने हालात और भी तनावपूर्ण बना दिए हैं। प्राथमिक स्कूलों के शिक्षक वेतन वृद्धि और सेवा संबंधी मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं।

देश की राजधानी से लेकर सुदूर क्षेत्रों तक स्कूलों में शिक्षण कार्य ठप हो चुका है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि जब तक उनकी माँगें नहीं मानी जातीं, तब तक काम पर वापस लौटना संभव नहीं।

हड़ताल की देशव्यापी गूंज

रिपोर्टों के अनुसार, 5 मई से शिक्षकों ने आंशिक रूप से काम का बहिष्कार शुरू किया था, लेकिन अब उन्होंने पूरी तरह से पठन-पाठन और प्रशासनिक कार्यों से खुद को अलग कर लिया है। ढाका, चटगांव, रंगमती, राजशाही और रंगपुर जैसे क्षेत्रों में इसका खासा असर देखा गया है। वहीं, कुछ क्षेत्रों जैसे बरिशाल में हड़ताल अपेक्षाकृत कम प्रभावी रही।

क्या हैं शिक्षकों की प्रमुख माँगें?

शिक्षक तीन मुख्य माँगों को लेकर आंदोलनरत हैं:

  1. राष्ट्रीय वेतनमान के तहत 11वीं ग्रेड में वेतन निर्धारण।

  2. 10 और 16 वर्ष की सेवा के बाद पदोन्नति का अधिकार।

  3. सहायक शिक्षकों को प्रधानाध्यापक पदों पर पदोन्नत करने की व्यवस्था।

इन माँगों के लिए प्राथमिक सहायक शिक्षक एकता परिषद के नेतृत्व में आंदोलन चल रहा है, जो लगातार तेज होता जा रहा है।

सरकारी कर्मचारियों में भी गहरा असंतोष

शिक्षकों के अलावा सरकारी कर्मचारी भी नई सेवा नीति को लेकर विरोध में हैं। उन्होंने ढाका के बांग्लादेश सचिवालय के बाहर प्रदर्शन कर मुख्य द्वार पर ताला तक लगा दिया। नए कानून के अंतर्गत अनुशासनहीनता के आधार पर अधिकारियों को तत्काल बर्खास्त करने का प्रावधान है, जिसे लेकर कर्मचारियों में भारी नाराजगी है।

राजनीतिक अस्थिरता और बढ़ता दबाव

इस बढ़ते विरोध के बीच अंतरिम सरकार पहले से ही सियासी दबाव में है। सेना प्रमुख जनरल वकार उज जमां ने हाल ही में चुनाव कराने पर जोर देकर राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया है। इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना भी सरकार की आलोचना करती नज़र आ रही हैं।

यूनुस सरकार फिलहाल विभिन्न राजनीतिक दलों से संवाद की कोशिश में लगी है ताकि कोई साझा समाधान निकाला जा सके। लेकिन विपक्षी दलों और जनआंदोलनों के तीव्र होते तेवर से स्पष्ट है कि स्थिति फिलहाल नियंत्रण में नहीं है।

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