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पुरुषोत्तम झा, हनुमानगढ़।
प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली इंदिरा गांधी नहर परियोजना एशिया की सबसे लंबी मानव निर्मित नहरों में गिनी जाती है। भारत ही नहीं, पूरी एशिया में जब नहरों की बात होती है तो इसका नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। लेकिन जितनी बड़ी यह परियोजना है, उतनी ही बड़ी इसकी समस्या भी है।
करीब 60 साल पहले इस नहर का निर्माण शुरू हुआ था। इसका डिज़ाइन 18500 क्यूसेक पानी बहाने के लिए बना था, लेकिन आज तक इसमें अधिकतम 12000 क्यूसेक पानी ही चलाया जा सका है। यानी नहर की पूरी क्षमता कभी भी इस्तेमाल नहीं हो पाई।
दुनिया में तकनीक तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन इस नहर की स्थिति सुधारने में सरकारों ने बहुत सुस्ती दिखाई है। अफसरों और नेताओं की उदासीनता का खामियाजा राजस्थान के लाखों किसानों को भुगतना पड़ रहा है। मानसून के समय जब पौंग और भाखड़ा बांधों में सरप्लस पानी आता है, तो उसे पाकिस्तान में बहा दिया जाता है, जबकि राजस्थान के किसान पानी के लिए तरसते हैं।
कागजी खानापूर्ति में अटकी योजना
करीब साढ़े तीन साल पहले, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पंजाब के मुख्यमंत्री से मिलकर हरिके हैड वर्क्स की क्षमता बढ़ाने की बात की थी। पंजाब सरकार ने इसके लिए मॉडल स्टडी करवाई और रिपोर्ट में सभी गेट खोलकर 18500 क्यूसेक पानी चलाने की अनुमति भी दी गई।
लेकिन अब समस्या यह है कि पंजाब में इंदिरा गांधी फीडर की नहर जगह-जगह से टूटी हुई है। इस कारण से अफसर तय डिज़ाइन के अनुसार पानी नहीं चला पा रहे। जब तक पंजाब, राजस्थान और केंद्र सरकार मिलकर फीडर की मरम्मत नहीं कराते, तब तक इस नहर में पूरा पानी नहीं चलाया जा सकेगा।
पंजाब ने पानी पर कर लिया कब्जा
जब नहर का निर्माण शुरू हुआ था, तब राजस्थान अपने हिस्से का पूरा पानी लेने में सक्षम नहीं था। इसलिए कुछ पानी अस्थायी रूप से पंजाब को दिया गया। लेकिन अब पंजाब ने उस पानी पर अपना हक जमा लिया है।
अब जबकि राजस्थान का नहर तंत्र विकसित हो चुका है और राजस्थान भाग में नहर की मरम्मत (रीलाइनिंग) का काम लगभग पूरा हो चुका है, तो जरूरी है कि पंजाब क्षेत्र में भी फीडर की मरम्मत की जाए। इससे नहर की उम्र 80 साल और बढ़ सकती है।
जरूरी तथ्य (फैक्ट फाइल)
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इंदिरा गांधी नहर की कुल लंबाई 649 किमी है। इसमें 445 किमी हिस्सा राजस्थान में है।
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यह नहर हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, बीकानेर, जैसलमेर, चूरू, नागौर सहित 13 जिलों को पानी देती है।
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1958 में नहर का निर्माण शुरू हुआ और 11 अक्टूबर 1963 को पहली बार राजस्थान के नौरंगदेसर वितरिका में पानी छोड़ा गया।
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इस नहर से राजस्थान में हर साल 6000-7000 करोड़ रुपये का कृषि उत्पादन होता है।
तेजी दिखाए सरकार
किसान नेता ओम जांगू का कहना है कि आज तक हरिके हैड वर्क्स से तय डिज़ाइन के अनुसार राजस्थान को पानी नहीं मिल पाया है। यह बहुत गंभीर मामला है। राजस्थान क्षेत्र की नहरें पक्की हो गई हैं, लेकिन पंजाब क्षेत्र की नहरें टूट गई हैं।
राजस्थान सरकार ने पंजाब क्षेत्र में नहर की मरम्मत के लिए डीपीआर (डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट) बनाने की पहल की है। अब इसमें देरी नहीं होनी चाहिए। केंद्र और राज्यों को मिलकर बजट स्वीकृत कर जल्द काम शुरू करना चाहिए ताकि किसानों को उनका हक का पानी मिल सके।
इसके अलावा बांधों में पानी की आवक कम होने और नदियों के रास्ता बदलने जैसे कारणों पर भी शोध करना जरूरी है, ताकि भविष्य में पानी की समस्या को दूर किया जा सके।
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