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ब्रिटिश शासन द्वारा थोपी गई मैकाले की शिक्षा नीति ने भारतीय समाज की सोच, ज्ञान और आत्मविश्वास को गहरा नुकसान पहुंचाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में कहा कि हमें इस नीति के असर से बाहर निकलने की जरूरत है और वर्ष 2035 तक इसके प्रभाव को पूरी तरह खत्म करने का संकल्प लिया है।
मैकाले की शिक्षा नीति का उद्देश्य आधुनिकता लाना नहीं था, बल्कि ऐसे भारतीय तैयार करना था जो शरीर से भारतीय हों, लेकिन सोच में अंग्रेज। इसने हमारी स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों, भाषाओं और संस्कृति को कमजोर किया। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि यह सोचने और समझने का तरीका भी होती है। पिछले 75 वर्षों में कई भाषाएं और उनके साथ जुड़ी जीवन-दृष्टि धीरे-धीरे खो गई।
इस नीति ने समाज में सामुदायिक जीवन और आपसी विश्वास को भी कमजोर किया। पहले शिक्षा जीवन और समाज से जुड़ी होती थी, लेकिन अब यह केवल पाठ्यक्रम और परीक्षा तक सीमित रह गई है।
नई शिक्षा नीति और चुनौतियां
हाल में भारत ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से इस भूल को सुधारने की कोशिश की है। इसमें मातृभाषा में शिक्षा, भारतीय ज्ञान और संस्कृति को महत्व दिया गया है। लेकिन केवल नीति बनाना ही पर्याप्त नहीं है—उसे लागू करने वाले शिक्षक और संस्थान भी सक्षम होने चाहिए। कई जगह ऐसे लोग नीति लागू कर रहे हैं जिनके पास विषय का ज्ञान नहीं है, जिससे बदलाव सतही रह जाता है।
विश्व में भारतीय ज्ञान की बढ़ती मान्यता
विदेशी विश्वविद्यालय जैसे हार्वर्ड, येल और हाइडेलबर्ग हमारी पारंपरिक चिकित्सा, जल संरक्षण, मिट्टी प्रबंधन और प्रकृति आधारित जीवन शैली पर शोध कर रहे हैं। जबकि भारतीय शिक्षण संस्थान अभी भी पश्चिमी शोधों को कॉपी-पेस्ट करते हैं। अगर विदेशी इसे समझ सकते हैं, तो हम क्यों नहीं?
आवश्यक कदम
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विद्वानों का चयन ज्ञान, अनुभव और ईमानदारी के आधार पर होना चाहिए।
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स्थानीय भाषाओं में शोध और ज्ञान उत्पादन को बढ़ावा देना होगा।
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शिक्षा को समाज, समुदाय और प्रकृति से जोड़ना होगा।
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औपनिवेशिक सोच और विदेशी श्रेणियों पर प्रश्न उठाना होगा।
निष्कर्ष:
मैकाले की शिक्षा नीति ने भारतीय समाज की आत्मा को कमजोर किया। अब समय है कि हम अपनी परंपराओं, भाषाओं और ज्ञान स्रोतों को पुनर्जीवित करें। केवल तब भारतीय शिक्षा अपने मन, भाषा और अनुभव से मजबूत होगी। यही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
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