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भारत, ग्रीस और आर्मेनिया के खिलाफ तुर्की-पाक-अजरबैजान की तिकड़ी, नई रणनीति से क्षेत्रीय अस्थिरता का खतरा

अंकारा/इस्लामाबाद/बाकू: हाल के दिनों में तुर्की, पाकिस्तान और अजरबैजान के बीच रक्षा सहयोग को लेकर तेजी आई है, जिसने दक्षिण एशिया और यूरोप दोनों ही क्षेत्रों में नई सुरक्षा चिंताओं को जन्म दिया है। तीनों देशों के शीर्ष नेताओं—तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोआन, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ और अजरबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव—ने हाल ही में एक त्रिपक्षीय बैठक के दौरान सामरिक सहयोग को और विस्तार देने की प्रतिबद्धता जताई।

यह विकास ऐसे समय में हुआ है जब भारत ने हालिया सैन्य अभ्यास ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में तुर्की निर्मित ड्रोन को सफलतापूर्वक निष्क्रिय किया था। इस सैन्य पराजय से तुर्की की सैन्य प्रतिष्ठा को झटका लगा है और अब वह भारत के सहयोगी देशों जैसे ग्रीस और आर्मेनिया पर भी अप्रत्यक्ष दबाव बनाने की कोशिश में है।

तुर्की की ग्रीस को धमकी: भारत-पाक युद्ध का हवाला

तुर्की और ग्रीस के बीच पहले से ही तनावपूर्ण संबंध हैं, लेकिन हाल में ग्रीस द्वारा फ्रांस से 24 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के बाद तुर्की की ओर से तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। तुर्की समर्थित मीडिया संस्थान ग्रीस के सैन्य आधुनिकीकरण पर सवाल उठा रहे हैं और एर्दोआन सरकार खुले तौर पर ग्रीस को चेतावनी दे रही है, जिसमें भारत-पाकिस्तान संघर्ष का हवाला देकर ग्रीस को डराने की कोशिश की जा रही है।

पाकिस्तान की कश्मीर नीति और भारत विरोधी गठबंधन

पाकिस्तान पहले से ही कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है। अब वह तुर्की और अजरबैजान के साथ मिलकर इस एजेंडे को और अधिक आक्रामक रूप से आगे बढ़ा रहा है। रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये देश सामरिक साझेदारी को महज़ हथियारों और प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रख रहे, बल्कि यह भारत और उसके मित्र देशों के खिलाफ एक वैचारिक और रणनीतिक मोर्चा भी बनता दिख रहा है।

अजरबैजान और आर्मेनिया: छाया संघर्ष की जमीन

अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच नागोर्नो-काराबाख को लेकर लंबे समय से तनाव है। भारत ने पारंपरिक रूप से आर्मेनिया का समर्थन किया है। ऐसे में अजरबैजान की तुर्की और पाकिस्तान के साथ नजदीकी, भारत के कूटनीतिक हितों पर भी असर डाल सकती है।


निष्कर्ष:

तुर्की, पाकिस्तान और अजरबैजान की नई त्रिपक्षीय रणनीति केवल सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़े क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को चुनौती देने की कोशिश है। भारत, ग्रीस और आर्मेनिया के लिए यह गठजोड़ भविष्य में सुरक्षा और कूटनीतिक मोर्चों पर नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर सकता है। NATO और अन्य वैश्विक ताकतों के लिए भी यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है।

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