प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साइप्रस की राजधानी निकोसिया में व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आयोजित एक गोलमेज बैठक में भाग लिया। इस बैठक में साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलिडेस और दोनों देशों के व्यापार जगत के प्रमुख लोगों ने हिस्सा लिया।
पीएम मोदी ने बैठक में भारत की आर्थिक प्रगति और वैश्विक व्यापार में बढ़ती भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि पिछले दशक में किए गए सुधारों के चलते भारत आज वैश्विक निवेशकों के लिए एक प्रमुख गंतव्य बन गया है। उन्होंने यह भी बताया कि भारत में आज दुनिया के कुल डिजिटल लेनदेन का लगभग 50% हिस्सा है, जो यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) जैसी तकनीकों की सफलता का प्रतीक है।
यूपीआई सेवाओं की शुरुआत साइप्रस में
प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) और साइप्रस के यूरोबैंक के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए, जिसके तहत साइप्रस में सीमा पार डिजिटल लेनदेन के लिए यूपीआई सेवाएं शुरू की जाएंगी। यह पहल भारत और यूरोप के बीच डिजिटल वित्तीय सहयोग का एक नया अध्याय खोलेगी।
व्यापार, टेक्नोलॉजी और पर्यटन में सहयोग की संभावनाएँ
प्रधानमंत्री ने कहा कि साइप्रस को यूरोप का एक प्रमुख पर्यटन स्थल माना जाता है, और भारत भी पर्यटन गंतव्यों के विकास तथा उनके प्रबंधन पर विशेष ध्यान दे रहा है। ऐसे में दोनों देशों के टूर ऑपरेटरों के बीच साझेदारी लाभदायक हो सकती है। इसके अलावा इनोवेशन, एनर्जी, टेक्नोलॉजी, स्टार्टअप, AI और फिनटेक जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं।
साइप्रस भारत के लिए यूरोप का प्रवेश द्वार
मोदी ने यह भी उल्लेख किया कि कई भारतीय कंपनियाँ साइप्रस को यूरोप में व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण प्रवेश द्वार मानती हैं। इसी कारण साइप्रस के साथ व्यापारिक संबंधों को मजबूती देना भारत की आर्थिक रणनीति का अहम हिस्सा है।
भारत की विकास गाथा पर जोर
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की आर्थिक प्रगति को साझा करते हुए कहा कि व्यापार सुगमता के साथ-साथ विश्वास का माहौल बनाना उनकी सरकार की प्राथमिकता रही है। उन्होंने साइप्रस के व्यापारिक समुदाय को भारत में निवेश के लिए आमंत्रित करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सहयोग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है।
भविष्य की दिशा
यह दौरा पिछले दो दशकों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की साइप्रस यात्रा के रूप में ऐतिहासिक रहा है। विदेश मंत्रालय ने इसे भारत और यूरोपीय संघ के साथ गहरे जुड़ाव की दिशा में एक ठोस कदम बताया है।
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