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महाराष्ट्र के भिवंडी-निजामपुर नगर निगम में मेयर चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक उलटफेर हुआ है। भाजपा के 22 पार्षदों में से 9 पार्षदों ने पार्टी छोड़कर अलग गुट बना लिया है और कांग्रेस गठबंधन को समर्थन देने का ऐलान किया है। इससे भिवंडी में सत्ता का समीकरण बदल गया है।
बदला राजनीतिक गणित
भाजपा से अलग हुए इन 9 पार्षदों ने “भिवंडी सेक्युलर फ्रंट” (BSF) बनाया है। कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी (एसपी) के गठबंधन को अब इस नए गुट का समर्थन मिल गया है। 90 सदस्यीय सदन में बहुमत के लिए 46 सीटें जरूरी हैं। बताया जा रहा है कि कांग्रेस गठबंधन के पास अब 50 से ज्यादा पार्षदों का समर्थन है, जिससे मेयर पद का रास्ता साफ हो गया है।
भाजपा और शिवसेना में मतभेद
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि भाजपा और एकनाथ शिंदे की शिवसेना के बीच मतभेद बढ़ने से यह स्थिति बनी। स्थानीय स्तर पर आपसी खींचतान और रणनीति की कमी के कारण भाजपा अपने पार्षदों को एकजुट नहीं रख सकी। वहीं समाजवादी पार्टी ने भी शिवसेना को समर्थन देकर समीकरणों को जटिल बना दिया था, लेकिन अंत में फायदा कांग्रेस को मिलता दिख रहा है।
गिरफ्तारी से बढ़ा विवाद
शिवसेना ने कोणार्क विकास पार्टी (केवीए) के साथ मिलकर मेयर बनाने की योजना बनाई थी। लेकिन केवीए प्रमुख और पूर्व मेयर विलास पाटिल की गिरफ्तारी के बाद यह योजना सफल नहीं हो पाई। पाटिल को कथित धोखाधड़ी के मामले में गिरफ्तार किया गया था। शिंदे गुट के नेताओं ने इसे साजिश बताया, जिससे भाजपा और शिवसेना के रिश्ते और खराब हो गए।
चुनाव परिणाम और मौजूदा स्थिति
हाल ही में हुए नगर निगम चुनाव में कांग्रेस 30 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। भाजपा को 22, शिवसेना को 12 और एनसीपी (एसपी) को 12 सीटें मिली थीं। अन्य दलों और निर्दलीयों ने भी कुछ सीटें जीती थीं। भाजपा और शिवसेना ने यह चुनाव गठबंधन में लड़ा था।
अब भाजपा के 9 पार्षदों की बगावत के बाद कांग्रेस की स्थिति मजबूत हो गई है। 16 फरवरी को नामांकन के बाद अब सबकी नजर 20 फरवरी को होने वाले मेयर चुनाव पर है।
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