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भीलवाड़ा का मक्का विदेश तक जा रहा, स्थानीय उद्योग को सरकारी मदद का इंतजार

राजस्थान का टेक्सटाइल सिटी कहलाने वाला भीलवाड़ा अब मक्का उत्पादन में भी प्रदेश में आगे है। यहां की मक्का को लोग ‘पीला सोना’ कहते हैं। लेकिन साफ सरकारी नीति और सुविधाओं की कमी के कारण इसका पूरा फायदा जिले को नहीं मिल पा रहा है।

उद्योग लगाने को तैयार, लेकिन सुविधाएं नहीं

भीलवाड़ा में मक्का आधारित उद्योगों की बड़ी संभावनाएं हैं। फूड प्रोसेसिंग यूनिट और एथेनॉल प्लांट यहां आसानी से लग सकते हैं। उद्यमी भी निवेश करना चाहते हैं, लेकिन जमीन और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं को लेकर सरकार की ओर से स्पष्ट नीति नहीं है। इसी वजह से कई निवेशक अपने प्रोजेक्ट मध्य प्रदेश के नीमच में ले जा रहे हैं।

इससे भीलवाड़ा को रोजगार और राजस्व दोनों का नुकसान हो रहा है।

मक्का की भारी मांग

भीलवाड़ा में दो तरह की मक्का पैदा होती है—

  • देशी मक्का: खाने में उपयोग

  • हाइब्रिड (शंकर) मक्का: पोल्ट्री फार्म, पशु आहार और एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल

यहां की मक्का हरियाणा, पंजाब, अजमेर और रायला जैसे इलाकों में भेजी जा रही है। सालाना करीब 5 लाख क्विंटल मक्का की औद्योगिक मांग रहती है।

उत्पादन में भीलवाड़ा सबसे आगे

कृषि विभाग के अनुसार मक्का उत्पादन में भीलवाड़ा राजस्थान में पहले स्थान पर है। इसके बाद चित्तौड़गढ़, उदयपुर, बांसवाड़ा और राजसमंद आते हैं।

सरकार से उम्मीद

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सरकार सही नीति बनाए तो भीलवाड़ा की मक्का से स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकती है।
जरूरी कदम—

  • एथेनॉल प्लांट के लिए सब्सिडी और जमीन नीति

  • फूड प्रोसेसिंग के लिए मक्का क्लस्टर

  • वेयरहाउस और कोल्ड स्टोरेज की सुविधा बढ़ाना

अगर ये कदम उठाए जाएं, तो भीलवाड़ा का ‘पीला सोना’ यहीं के लोगों के लिए खुशहाली ला सकता है।

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