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जयपुर: वायु प्रदूषण को कम करने के लिए राजस्थान में अब गुजरात की तर्ज पर उत्सर्जन व्यापार योजना (ETS) लागू करने की तैयारी शुरू हो गई है। इस योजना के तहत औद्योगिक क्षेत्रों में फैक्टरियों से निकलने वाले सल्फर डाइऑक्साइड (SO2) उत्सर्जन पर नजर रखी जाएगी।
इस योजना में फैक्टरियां प्रदूषण “खरीद-बेच” सकेंगी। यानी जो उद्योग तय सीमा से कम धुआं छोड़ेंगे, वे अपने बचे हुए परमिट दूसरी फैक्टरियों को बेच सकेंगे। वहीं ज्यादा प्रदूषण करने वाली इकाइयों को अतिरिक्त परमिट खरीदने होंगे। इससे कम प्रदूषण करने वाले उद्योगों को आर्थिक लाभ मिलेगा।
कैसे काम करेगी योजना?
राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल अब केवल नोटिस या जुर्माना लगाने के बजाय उद्योगों को ETS योजना से जोड़ेगा। इसमें प्रदूषण की एक तय सीमा (कैप) निर्धारित की जाएगी और उसी आधार पर उद्योगों को परमिट दिए जाएंगे।
अगर कोई फैक्टरी तय सीमा से कम उत्सर्जन करती है, तो वह अपने अतिरिक्त परमिट बेच सकती है। जो उद्योग अधिक प्रदूषण करेगा, उसे अतिरिक्त परमिट खरीदने पड़ेंगे।
अध्ययन जारी, अप्रैल में आएगी रिपोर्ट
योजना लागू करने से पहले इसका विस्तृत अध्ययन कराया जा रहा है। इसके लिए अब्दुल लतीफ जमील पॉवर्टी एक्शन लैब (J-PAL) दक्षिण एशिया और यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो ट्रस्ट के ऊर्जा नीति संस्थान (EPIC-India) के साथ पांच साल का समझौता किया गया है। अध्ययन की रिपोर्ट अप्रैल में आने की संभावना है।
इससे पहले मंडल ने पार्टिकुलेट मैटर (PM) पर भी अध्ययन कराया था।
17 सेक्टर की 130 इंडस्ट्रीज चिन्हित
मंडल ने सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन करने वाले 17 सेक्टर की 130 इंडस्ट्रीज को चिन्हित किया है। इनमें सीमेंट फैक्टरी, थर्मल पावर प्लांट और धातु गलाने के संयंत्र शामिल हैं। रिपोर्ट आने के बाद इन्हीं उद्योगों से योजना की शुरुआत होगी।
गुजरात में मिले अच्छे नतीजे
देश में यह मॉडल सबसे पहले गुजरात में लागू किया गया था। सूरत में पार्टिकुलेट मैटर पर कैप-एंड-ट्रेड सिस्टम लागू करने के बाद दो साल में प्रदूषण में करीब 24 प्रतिशत की कमी आई। इसके बाद इसे अहमदाबाद में लागू किया गया और अब वडोदरा, राजकोट, वापी और भरूच जैसे शहरों में भी इसे लागू करने की तैयारी है।
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