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बचपन में होने वाला सामान्य गले का संक्रमण कभी-कभी गंभीर रूप ले सकता है। डॉक्टरों के अनुसार रूमेटिक फीवर ऐसी बीमारी है, जिसे अक्सर हल्का समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। लेकिन समय पर इलाज न मिलने पर यह दिल के वॉल्व को नुकसान पहुंचा सकती है।
30 से 40 प्रतिशत बच्चों में खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि जिन बच्चों को बार-बार गले का संक्रमण या रूमेटिक फीवर होता है, उनमें से लगभग 30 से 40 प्रतिशत बच्चों में आगे चलकर हार्ट वॉल्व की बीमारी हो सकती है।
इस स्थिति में दिल के वॉल्व ठीक से काम नहीं करते। इसके कारण सांस फूलना, जल्दी थकान, सीने में दर्द और दिल की धड़कन तेज होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
कैसे बढ़ता है खतरा?
रूमेटिक फीवर आमतौर पर गले के संक्रमण से शुरू होता है। अगर समय पर एंटीबायोटिक या सही इलाज नहीं किया जाए, तो संक्रमण शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित कर दिल के वॉल्व पर असर डाल सकता है।
डॉक्टरों के अनुसार भारत जैसे देशों में यह अब भी बड़ी स्वास्थ्य समस्या है।
हर साल हजारों जानें जाती हैं
दुनिया भर में हर साल लगभग तीन लाख लोगों की मौत इस बीमारी से जुड़ी जटिलताओं के कारण होती है। सबसे ज्यादा असर माइट्रल वॉल्व पर पड़ता है, जबकि कई मामलों में एओर्टिक वॉल्व भी प्रभावित होता है।
गंभीर स्थिति में मरीज को वॉल्व रिपेयर या वॉल्व बदलने की सर्जरी तक करानी पड़ सकती है।
क्या करें?
विशेषज्ञों की सलाह है कि बच्चों में अगर गले में दर्द, बुखार या जोड़ों में दर्द जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत डॉक्टर से जांच कराएं।
समय पर इलाज, नियमित जांच और जागरूकता ही इस बीमारी से बचने का सबसे बेहतर तरीका है।
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