वॉशिंगटन/रियाद: अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सीरिया को लेकर एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लिया है। हाल ही में सऊदी अरब में सीरिया के अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा से मुलाकात के बाद ट्रंप प्रशासन ने सीरिया पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में अस्थायी राहत देने की घोषणा की है। यह फैसला सीरिया के पुनर्निर्माण की दिशा में एक बड़ा संकेत माना जा रहा है।
सीजर एक्ट में मिली अस्थायी राहत
अमेरिका ने वर्ष 2019 में लागू किए गए Caesar Syria Civilian Protection Act के तहत लगे प्रतिबंधों को 180 दिनों (छह महीनों) के लिए आंशिक रूप से निलंबित कर दिया है। इस निर्णय के तहत अब अमेरिकी कंपनियां और निवेशक सीमित दायरे में सीरिया के केंद्रीय बैंक और अन्य चुनी गई संस्थाओं के साथ व्यापार कर सकेंगे।
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग और विदेश विभाग की सहमति से यह निर्णय लिया गया, हालांकि प्रशासन ने साफ किया है कि यह छूट स्थायी नहीं है और छः महीने बाद हालात की समीक्षा कर के दोबारा प्रतिबंध लागू किए जा सकते हैं।
ट्रंप की सोच: ‘सीरिया को दूसरा मौका मिलना चाहिए’
डोनाल्ड ट्रंप ने इस फैसले को “एक नई शुरुआत” बताते हुए कहा, “अगर हमने सीरिया को पुनर्निर्माण का मौका नहीं दिया, तो वहां फिर से आतंकवाद और चरमपंथ की वापसी हो सकती है।”
हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वर्तमान अंतरिम सरकार के नेता अहमद अल-शरा का अतीत विवादास्पद रहा है। माना जाता है कि वे कभी हयात तहरीर अल-शाम (पूर्व में अल-कायदा से जुड़ा संगठन) के मिलिशिया कमांडर रहे हैं। ऐसे में वैश्विक स्तर पर उनकी सरकार को अभी भी पूरा समर्थन और वैधता नहीं मिल पाई है।
सीरिया में पुनर्निर्माण की भारी जरूरत
सीरिया करीब 13 वर्षों से गृहयुद्ध, विदेशी हस्तक्षेप और आतंकी हिंसा से तबाह हो चुका है। बुनियादी ढांचा लगभग पूरी तरह नष्ट हो चुका है, 4.5 करोड़ से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं और देश की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है।
अहमद अल-शरा, जिन्होंने पिछले वर्ष बशर अल-असद को अपदस्थ कर अंतरिम सरकार की बागडोर संभाली थी, अंतरराष्ट्रीय मदद की मांग लगातार कर रहे हैं।
सऊदी मुलाकात बनी बदलाव की वजह
ट्रंप और अहमद अल-शरा के बीच इस महीने की शुरुआत में सऊदी अरब में हुई मुलाकात को इस फैसले की मुख्य वजह माना जा रहा है। दोनों नेताओं ने सीरिया के भविष्य, आतंकवाद से निपटने और पुनर्निर्माण में अमेरिकी भूमिका पर चर्चा की थी।
विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला अमेरिका की रणनीति में आंशिक लचीलापन दिखाता है और इससे क्षेत्रीय स्थिरता की उम्मीदें फिर से जगी हैं।
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