ढाका: बांग्लादेश में एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता गहराती नजर आ रही है। राजधानी ढाका में हाल ही में हुई गुप्त सैन्य बैठक, प्रशासनिक फेरबदल, और अंतरिम नेता मोहम्मद यूनुस के संभावित इस्तीफे की अटकलों ने देश की राजनीति को अनिश्चितता की ओर धकेल दिया है।
इस घटनाक्रम पर लेखक और विश्लेषक संदीप घोष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व ट्विटर) पर लिखा, “बांग्लादेश भले ही पाकिस्तान से अलग हुआ हो, लेकिन पाकिस्तान जैसा व्यवहार उससे पूरी तरह गया नहीं है।” उनका संकेत था कि देश एक बार फिर सैन्य हस्तक्षेप और संस्थाओं की कमजोरी जैसे पुराने दौर की ओर लौट सकता है।
सेना की भूमिका पर उठे सवाल
हाल की घटनाओं से संकेत मिलते हैं कि बांग्लादेश की सेना एक बार फिर सरकार की नीतियों में प्रभावशाली भूमिका निभाने की कोशिश कर रही है। सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज-जमान ने एक आंतरिक बैठक में कथित तौर पर कहा कि देश की राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है और बाहरी हस्तक्षेप को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान सैन्य शक्ति के बढ़ते हस्तक्षेप की तरफ इशारा करता है।
प्रशासनिक फेरबदल ने और बढ़ाई हलचल
इसी बीच, विदेश सचिव जाशिम उद्दीन के अचानक हटाए जाने की खबरों ने स्थिति को और तनावपूर्ण बना दिया है। हालांकि, विदेश मामलों के सलाहकार एम. तौहीद हुसैन ने सफाई दी कि जाशिम उद्दीन ने स्वेच्छा से पद छोड़ने की इच्छा जताई थी, और उन्हें हटाने जैसा कोई निर्णय नहीं लिया गया।
लेकिन ‘द डेली स्टार’ अखबार के अनुसार, विदेश मंत्रालय में इन घटनाओं को लेकर भारी असमंजस का माहौल है। दिलचस्प बात यह है कि सेवानिवृत्त राजनयिक सूफीउर रहमान, जिन्हें हाल ही में विदेश मामलों के विशेष सहायक के रूप में नियुक्त किया गया था, उन्होंने अब तक अपने नए दायित्वों को संभालना शुरू नहीं किया है।
क्या बांग्लादेश लौट रहा है पुराने दौर में?
राजनीतिक विशेषज्ञों और सामाजिक विश्लेषकों को आशंका है कि ये घटनाएं बांग्लादेश को एक बार फिर उस दौर की ओर ले जा सकती हैं, जहां लोकतंत्र कमजोर था और सेना का दखल लगातार बना रहता था। यह स्थिति लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक प्रशासन के लिए एक बड़ा खतरा मानी जा रही है।
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