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हाईकोर्ट ने कहा-रीति-रिवाजों को न्याय के आगे झुकना होगा:’नाता प्रथा’ संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ; ऐसी प्रथाओं को समाज से बाहर फेंक देना चाहिए

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- न्याय के आगे झुकने होंगे रीति-रिवाज

राजस्थान हाईकोर्ट ने सामाजिक कुप्रथाओं को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि कोई भी रीति-रिवाज या परंपरा संविधान और न्याय से ऊपर नहीं हो सकती। अदालत ने ‘नाता प्रथा’ को महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ बताते हुए कहा कि ऐसी प्रथाओं को समाज से बाहर कर देना चाहिए।

कोर्ट ने साफ कहा कि अगर कोई सामाजिक परंपरा किसी व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और समानता के अधिकार को नुकसान पहुंचाती है, तो उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। न्यायालय के अनुसार, समाज में चली आ रही कोई भी प्रथा तभी तक मान्य हो सकती है, जब तक वह संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ न हो।

अदालत ने कहा कि महिलाओं को वस्तु की तरह देखने वाली या उनकी इच्छा और अधिकारों को नजरअंदाज करने वाली प्रथाएं आधुनिक समाज में जगह नहीं रखतीं। संविधान हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है और इस अधिकार के सामने किसी भी पुरानी परंपरा को टिकने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को सामाजिक सुधार की दिशा में अहम माना जा रहा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य कमजोर और पीड़ित वर्गों के अधिकारों की रक्षा करना है। इसलिए ऐसी प्रथाओं को बढ़ावा देने के बजाय समाज को इनके खिलाफ जागरूक होना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि नाता प्रथा जैसी परंपराएं कई बार महिलाओं के शोषण और अधिकारों के हनन का कारण बनती हैं। हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद प्रशासन और समाज दोनों से उम्मीद की जा रही है कि वे ऐसी कुप्रथाओं को खत्म करने के लिए गंभीर कदम उठाएंगे।

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