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1256 हत्याओं का दोषी, 13 महिलाओं का बलात्कारी… अब बांग्लादेश में ‘हीरो’ बना एटीएम अजहरुल इस्लाम

बांग्लादेश में 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान युद्ध अपराधों के दोषी रहे जमात-ए-इस्लामी के नेता एटीएम अजहरुल इस्लाम को देश की सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सभी आरोपों से बरी कर दिया है। 73 वर्षीय अजहरुल की रिहाई के बाद ढाका में उसके स्वागत में सैकड़ों समर्थक जुटे, जिससे देश की राजनीति और न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।


⚖️ मौत की सजा से बरी, अब “स्वतंत्र नागरिक”

अजहरुल इस्लाम को पहले 2014 में बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT) ने पांच मामलों में मौत की सजा सुनाई थी। उस पर लगे थे:

  • 1,256 लोगों की हत्या

  • 17 अपहरण

  • 13 महिलाओं से बलात्कार

  • सैकड़ों घरों को जलाने और दंगे भड़काने के आरोप

2015 में उसने इस फैसले को चुनौती देते हुए अपील दायर की, जिसमें खुद को निर्दोष बताया। 28 मई, 2025 को सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय पीठ ने, जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस सैयद रेफात अहमद कर रहे थे, उसे सभी आरोपों से मुक्त कर दिया


🕌 रिहाई पर आतंकी समर्थकों का जश्न

रिहाई के बाद अजहरुल इस्लाम ने कहा,

“मैं अब एक स्वतंत्र देश का स्वतंत्र नागरिक हूं, अल्हम्दुलिल्लाह। अगर अल्लाह ने चाहा, तो मैं अपने बाकी जीवन में आपके साथ रहूंगा।”

उसके बाहर आते ही जमात-ए-इस्लामी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उसे नायक की तरह सम्मान दिया। ढाका की सड़कों पर हुए इस ‘स्वागत’ से यह साफ झलकता है कि बांग्लादेश में धार्मिक कट्टरपंथियों को किस तरह राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है।


🔍 कौन है एटीएम अजहरुल इस्लाम?

  • वह जमात-ए-इस्लामी, एक कट्टर इस्लामिक राजनीतिक संगठन, का शीर्ष नेता है।

  • 1971 के मुक्ति संग्राम के समय रंगपुर क्षेत्र में वह पाकिस्तानी सेना के सहयोगी के रूप में काम कर रहा था।

  • मानवता के खिलाफ 9 बड़े आरोपों में उसे दोषी ठहराया गया था।


🧨 यूनुस सरकार पर उठे सवाल

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस फैसले से यह संदेश गया है कि यूनुस सरकार के कार्यकाल में आतंकवाद और चरमपंथियों के प्रति नरमी बरती जा रही है। एक ओर जहां बांग्लादेश की सरकार विकास और लोकतंत्र की बात करती है, वहीं दूसरी ओर आतंकी संगठनों से जुड़े लोगों को खुली छूट मिलती दिख रही है।


निष्कर्ष: न्याय या समझौता?

अजहरुल इस्लाम की रिहाई ने यह सवाल खड़ा कर दिया है — क्या बांग्लादेश में कानून का राज है या सियासी समझौते चल रहे हैं? जिन लोगों ने 1971 की क्रूरता देखी है, उनके लिए यह फैसला न्याय नहीं, बल्कि एक गहरी चोट की तरह है।

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