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ब्रिटेन ने वर्षों बाद मॉरीशस को सौंपा चागोस द्वीपसमूह, भारत ने फैसले का स्वागत किया

नई दिल्ली/पोर्ट लुई: दशकों पुराने विवाद के बाद ब्रिटेन ने हिंद महासागर में स्थित चागोस द्वीपसमूह को मॉरीशस को सौंपने पर सहमति जता दी है। हालांकि, इस सौदे के अंतर्गत सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण डिएगो गार्सिया द्वीप पर ब्रिटेन और अमेरिका का सैन्य अड्डा बना रहेगा।

इस समझौते के तहत, ब्रिटेन अगले 99 वर्षों तक डिएगो गार्सिया द्वीप को लीज़ पर रखेगा और इसके बदले मॉरीशस को सालाना 10 करोड़ पाउंड की राशि देगा। जबकि द्वीपसमूह के शेष हिस्सों पर मॉरीशस की सम्प्रभुता तुरंत प्रभाव से बहाल हो जाएगी।

डिएगो गार्सिया द्वीप पर मौजूद सैन्य अड्डा अमेरिका और ब्रिटेन की सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसका इस्तेमाल वियतनाम युद्ध से लेकर हालिया पश्चिम एशियाई अभियानों तक में किया गया है।


भारत की प्रतिक्रिया

भारत ने इस ऐतिहासिक समझौते का स्वागत करते हुए इसे क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय नियमों के सम्मान की दिशा में एक अहम कदम बताया है। विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, “यह समझौता उपनिवेशवाद के अवशेषों को समाप्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है और भारत, मॉरीशस के इस न्यायसंगत दावे का हमेशा से समर्थन करता आया है।”

भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत हिंद महासागर में अपने साझेदार देशों के साथ मिलकर क्षेत्रीय शांति और समृद्धि के लिए कार्य करता रहेगा।


मॉरीशस में खुशी की लहर

इस फैसले के बाद मॉरीशस में राष्ट्रीय गर्व और जश्न का माहौल है। प्रधानमंत्री नवीन रामगुलाम ने इसे “राष्ट्रीय संप्रभुता की जीत” बताया और कहा कि चागोसवासियों को अब उनके अधिकार और भूमि वापस मिल रहे हैं।

हालाँकि, कुछ चागोसवासी डिएगो गार्सिया के ब्रिटिश-अमेरिकी नियंत्रण में रहने को लेकर असंतुष्ट हैं। उनके अनुसार, द्वीपसमूह का भविष्य तय करने में स्थानीय निवासियों की राय को पूरी तरह से शामिल नहीं किया गया।


चीन की बढ़ती उपस्थिति को लेकर चिंता

इस समझौते के पीछे एक कारण चीन की हिंद महासागर में बढ़ती रणनीतिक उपस्थिति भी मानी जा रही है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने स्वीकार किया कि अगर यह समझौता नहीं किया जाता, तो चीन जैसे देश क्षेत्रीय सैन्य संतुलन को प्रभावित कर सकते थे।

समझौते की शर्तों के अनुसार, डिएगो गार्सिया के चारों ओर 24 मील का बफ़र ज़ोन निर्धारित किया गया है, जहाँ बिना ब्रिटेन की अनुमति के कोई सैन्य या अन्य निर्माण नहीं किया जा सकेगा।


इतिहास की एक झलक

चागोस द्वीपसमूह, जिसमें करीब 60 द्वीप शामिल हैं, पहले ब्रिटिश उपनिवेश मॉरीशस का हिस्सा था। 1968 में मॉरीशस की स्वतंत्रता से ठीक पहले ब्रिटेन ने इसे 3 मिलियन पाउंड में खरीद लिया था। बाद में, यहां से स्थानीय निवासियों को जबरन हटाकर सैन्य अड्डा स्थापित किया गया।

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