इस्लामाबाद/अंकारा:
पाकिस्तान और तुर्किए की खुफिया एजेंसियों के बीच हुए एक दुर्लभ और सफल सहयोग के तहत, आतंकवादी संगठन दाएश (ISIS) से जुड़े एक शीर्ष ऑपरेटिव ओज़गुर अल्तुन को गिरफ्तार कर लिया गया है। यह गिरफ्तारी न केवल तुर्किए की सुरक्षा के लिहाज से बड़ी सफलता मानी जा रही है, बल्कि दोनों देशों के बीच खुफिया साझेदारी को भी एक नई ऊंचाई पर ले जाती है।
अफगान सीमा पर हुआ ऑपरेशन
सूत्रों के मुताबिक, तुर्किए के राष्ट्रीय खुफिया संगठन (MIT) और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने मिलकर यह ऑपरेशन अंजाम दिया। पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा के पास हुई इस कार्रवाई में ओज़गुर अल्तुन—जो “अबू यासिर अल तुर्की” के नाम से भी जाना जाता है—को हिरासत में लिया गया।
कौन है ओज़गुर अल्तुन?
ओज़गुर अल्तुन को तुर्की सरकार वर्षों से एक “मोस्ट वांटेड” आतंकवादी के रूप में खोज रही थी। बताया गया है कि वह दाएश के मीडिया सेल का प्रमुख था और संगठन के प्रचार तंत्र को संचालित करता था। उस पर तुर्किए के भीतर कई आतंकी साजिशों को अंजाम देने और उग्रवाद फैलाने का आरोप है।
तुर्किए के लिए रणनीतिक जीत
दाएश को तुर्किए सरकार ने 2013 में ही एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। इसके बाद से तुर्किए ने दाएश के खिलाफ कई आक्रामक अभियानों को अंजाम दिया है।
ओज़गुर अल्तुन की गिरफ्तारी को तुर्की मीडिया ने “सुरक्षा प्रतिष्ठान की बड़ी उपलब्धि” के रूप में पेश किया है, जो यह दर्शाता है कि तुर्किए और पाकिस्तान के बीच सुरक्षा सहयोग धीरे-धीरे गहराता जा रहा है।
पाकिस्तान ने लौटाया “कूटनीतिक ऋण”?
विश्लेषकों का मानना है कि तुर्किए द्वारा पहले पाकिस्तान को कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समर्थन दिए जाने के बाद, यह कार्रवाई एक तरह से उस समर्थन का जवाब भी है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और तुर्की राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन के बीच हाल के वर्षों में बेहद घनिष्ठ संबंध रहे हैं। अक्सर दोनों नेता एक-दूसरे को “भाई” कहकर संबोधित करते हैं।
भारत के लिए क्या संकेत?
भारत के लिए यह घटनाक्रम चिंताजनक हो सकता है, क्योंकि यह संकेत देता है कि पाकिस्तान और तुर्किए की खुफिया एजेंसियां अब सीमाओं से परे जाकर आतंकवाद विरोधी अभियानों में साझेदारी कर रही हैं। यह साझेदारी भविष्य में भारत के हितों के लिए एक नए प्रकार का रणनीतिक जोखिम खड़ा कर सकती है, खासकर जब इसका विस्तार अफगानिस्तान तक हो रहा है।
दाएश की मौजूदगी अभी भी ख़तरा
तुर्किए ने पिछले वर्ष भी दाएश के साथ संबंधों के आरोप में 32 संदिग्धों को हिरासत में लिया था, जो कथित तौर पर धार्मिक स्थलों और इराकी दूतावास पर हमलों की योजना बना रहे थे। इससे स्पष्ट है कि दाएश का नेटवर्क तुर्किए और इसके आसपास के क्षेत्रों में अभी भी सक्रिय और खतरनाक है।
निष्कर्ष:
ओज़गुर अल्तुन की गिरफ्तारी भले ही तुर्किए के लिए एक सामरिक सफलता हो, लेकिन यह अंतरराष्ट्रीय खुफिया साझेदारियों की नई दिशा भी दर्शाता है। भारत को अब इन बढ़ते समीकरणों पर बारीकी से नजर रखने की आवश्यकता है, ताकि क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित करने वाली किसी भी संभावित चुनौती का समय रहते सामना किया जा सके।
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