बूंदी।
राजस्थान की ऐतिहासिक नगरी बूंदी ने इस साल अपना 784वां स्थापना दिवस बड़े उत्साह और सांस्कृतिक रंगों के साथ मनाया। बूंदी को ‘छोटीकाशी’ और ‘कुंड-बावड़ियों की नगरी’ के नाम से भी जाना जाता है। यह शहर अपनी प्राचीन बावड़ियों, सुंदर झीलों, किलों, मंदिरों और चित्रकला के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है।
बूंदी की स्थापना और महत्व
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बूंदी की स्थापना सन् 1242 में राव देवा ने की थी।
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यह शहर महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण और वीर हाड़ीरानी जैसे वीरों और विद्वानों की भूमि रहा है।
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बूंदी अपने शौर्य, प्रेम, बलिदान और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है।
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यहां की चित्रशाला और मोरनी दरवाजे विदेशी पर्यटकों के लिए खास आकर्षण हैं।
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बूंदी को “सिटी ऑफ स्टेपवेल्स” यानी बावड़ियों का शहर भी कहा जाता है।
खास स्थल और पहचान
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गढ़ पैलेस, तारागढ़ किला, सुखमहल, नवल सागर झील जैसे दर्शनीय स्थल यहां स्थित हैं।
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चौरासी खंभों की छतरी, रानी जी की बावड़ी जैसी ऐतिहासिक धरोहरें भी यहां की शान हैं।
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गली-गली में मंदिर और धार्मिक स्थल होने के कारण इसे ‘छोटीकाशी’ कहा जाता है।
स्थापना दिवस के कार्यक्रम
पर्यटन अधिकारी प्रेमशंकर सैनी ने बताया कि 784वें स्थापना दिवस पर कई कार्यक्रम आयोजित हुए:
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सुबह 6 बजे गढ़ पैलेस में शहनाई वादन से कार्यक्रम की शुरुआत हुई।
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7 बजे गढ़ गणेश मंदिर में पूजा-अर्चना की गई।
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8:30 बजे बेटी गौरव उद्यान में पौधारोपण किया गया।
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10 बजे सुखमहल स्थित संग्रहालय में चित्रकला प्रदर्शनी का उद्घाटन हुआ।
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10 से 12 बजे तक शहर के प्रमुख स्थलों पर लोक कलाकारों की प्रस्तुतियां हुईं।
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शाम 7 बजे नवल सागर झील के किनारे सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया।
निशुल्क प्रवेश की सुविधा
संग्रहालय अधीक्षक जगदीश वर्मा ने बताया कि स्थापना दिवस पर विशेष छूट के तहत सुखमहल, रानी जी की बावड़ी और चौरासी खंभों की छतरी में नि:शुल्क प्रवेश की सुविधा दी गई।
निष्कर्ष
बूंदी का स्थापना दिवस न सिर्फ इसकी इतिहास और संस्कृति को जीवंत करने का मौका है, बल्कि यह नई पीढ़ी को अपनी विरासत से जोड़ने का माध्यम भी है। ऐसे आयोजनों से न सिर्फ पर्यटन को बढ़ावा मिलता है, बल्कि स्थानीय कला और कलाकारों को भी मंच मिलता है।
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