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बेंगलुरु।
राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने कहा है कि जनजातीय संस्कृति को केवल संग्रहालयों में सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे शिक्षा और समाज के विकास का हिस्सा बनाया जाए। उन्होंने यह बात बेंगलुरु के माउंट कार्मेल कॉलेज में हुए एक दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में कही। यह कार्यक्रम जनजातीय गौरव संगोष्ठी योजना के तहत आयोजित किया गया था और इसका उद्देश्य बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती का सम्मान करना था।
🌿 भारत की जनजातीय विविधता को बताया अमूल्य धरोहर
राज्यपाल गहलोत ने कहा कि भारत में 700 से ज्यादा मान्यता प्राप्त जनजातीय समुदाय हैं। उनकी भाषा, संगीत, नृत्य, रीति-रिवाज, जीवनशैली और परंपराएं न सिर्फ सांस्कृतिक धरोहर हैं, बल्कि प्राचीन ज्ञान और समझ के भी स्रोत हैं। यह विरासत सिर्फ इतिहास नहीं है, बल्कि हमारे भविष्य के लिए भी मार्गदर्शक बन सकती है।
🪶 बिरसा मुंडा को बताया प्रेरणा स्रोत
उन्होंने कहा कि बिरसा मुंडा सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मसम्मान और सामाजिक बदलाव के प्रतीक थे। उनका आंदोलन “उलगुलान” न केवल आज़ादी के लिए था, बल्कि धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता के लिए भी था।
🌱 प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली
राज्यपाल ने बताया कि आदिवासी समाजों की जीवनशैली पर्यावरण के साथ संतुलन में होती है। उनकी कृषि पद्धतियाँ, जैविक खाद, प्राकृतिक चिकित्सा, और वन-आधारित जीवनशैली सिर्फ परंपराएं नहीं बल्कि एक जीवंत और संतुलित जीवन का उदाहरण हैं।
👥 सम्मेलन में शामिल हुए विशेषज्ञ
इस कार्यक्रम में आईसीएसएसआर के सदस्य सचिव प्रोफेसर धनंजय सिंह, बेंगलुरु विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर जयकार शेट्टी, और माउंट कार्मेल कॉलेज की सिस्टर फ्रिडोलिन सहित कई शिक्षाविद, छात्र और शोधकर्ता शामिल हुए।
निष्कर्ष:
राज्यपाल गहलोत ने इस सम्मेलन में जनजातीय समाज के योगदान को समझने और उसे मुख्यधारा में शामिल करने की जरूरत पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि यह संस्कृति हमारी पहचान का अभिन्न हिस्सा है और इसे भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी है।
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