ईरान-इजरायल युद्ध अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है और इस पूरे घटनाक्रम पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बयान हलचल मचा रहा है। ट्रंप ने दो टूक कहा है कि इजरायल के पास अमेरिका की मदद के बिना ईरान की परमाणु साइट्स को तबाह करने की क्षमता नहीं है। साथ ही उन्होंने ईरान को दो हफ्तों की डेडलाइन भी दे दी है।
“इजरायल अकेले नहीं कर सकता सबकुछ”: ट्रंप
न्यू जर्सी में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने साफ कहा,
“अगर इजरायल को ईरान के सभी परमाणु ठिकानों को खत्म करना है, तो उसे अमेरिका की मदद की जरूरत पड़ेगी। उसके पास अकेले यह करने की ताकत नहीं है।”
इस बयान के साथ ही उन्होंने ईरान को दो सप्ताह की समयसीमा भी दी — यह स्पष्ट करते हुए कि अब वक़्त है कि “लोग होश में आएं।”
युद्धविराम की संभावना पर ट्रंप का रुख
हालांकि ट्रंप ने यह भी कहा कि अगर हालात कुछ हद तक स्थिर हुए तो वह युद्धविराम का समर्थन कर सकते हैं। लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि ईरान अब यूरोपीय देशों से नहीं बल्कि सिर्फ अमेरिका से बात करना चाहता है।
ट्रंप की नीति कितनी अलग?
ट्रंप ने अपने राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान JCPOA परमाणु समझौते से अमेरिका को बाहर कर लिया था, जिसे ओबामा प्रशासन ने ईरान के साथ किया था।
बाइडेन सरकार इस समझौते को फिर से शुरू करने की कोशिश में लगी रही, मगर ईरान की यूरेनियम संवर्धन गतिविधियों और इजरायल के जवाबी हमलों के चलते बात आगे नहीं बढ़ सकी।
अब ट्रंप का दो टूक संदेश है —
“या तो समझौता करो या परिणाम भुगतो।”
हमला क्यों हुआ?
इजरायल ने हाल ही में IAEA (अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी) की रिपोर्ट को आधार बनाते हुए ईरान के परमाणु ठिकानों पर हमला किया। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान परमाणु हथियारों की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
इसके जवाब में ईरान ने भी कड़ी प्रतिक्रिया दी है और लगातार तेल अवीव समेत इजरायली ठिकानों पर मिसाइल हमले कर रहा है।
निष्कर्ष: क्या बाइडेन की जगह ट्रंप फिर लाएंगे ‘फायर एंड फ्यूरी’?
ट्रंप की वापसी के साथ अमेरिका की विदेश नीति फिर से एक आक्रामक और अल्टीमेटम आधारित रणनीति की ओर बढ़ती दिख रही है। ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या वाकई अमेरिका इस तनाव में खुद को सैन्य रूप से झोंकेगा — या फिर यह केवल एक डिप्लोमैटिक दबाव रणनीति है।
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