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लखनऊ: उत्तर प्रदेश सरकार की पारदर्शी तबादला नीति पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सरकार के कई विभागों में 1000 से ज्यादा तबादले रद्द कर दिए गए हैं, जिससे कर्मचारियों में नाराजगी है। राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर इस पूरी प्रक्रिया की जांच की मांग की है।
तबादला नीति फेल, कर्मचारियों में असंतोष
परिषद का कहना है कि सरकार की “तबादला नीति” अब पूरी तरह पटरी से उतर चुकी है। 6 मई 2025 को जारी की गई नीति के तहत 15 जून तक स्थानांतरण प्रक्रिया पूरी की जानी थी, जिसमें पारदर्शिता, ऑनलाइन आवेदन, और मेरिट को प्राथमिकता दी जानी थी। लेकिन हकीकत में नीति की धज्जियां उड़ गईं।
दर्जनों विभागों में तबादले निरस्त
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निबंधन, होम्योपैथी, स्वास्थ्य, बेसिक शिक्षा, वन, पशुधन, कृषि, स्टांप रजिस्ट्रेशन जैसे विभागों में 1000 से अधिक तबादले रद्द किए गए हैं।
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कई विभागों में तो स्थानांतरण सत्र को ही शून्य घोषित कर दिया गया है, जो एक असामान्य कदम माना जा रहा है।
सबसे ज्यादा गड़बड़ी निबंधन विभाग में
सबसे गंभीर स्थिति निबंधन विभाग की रही, जो सीधे प्रमुख सचिव कार्मिक के अधीन है। यहां तबादलों में इतनी गड़बड़ी हुई कि मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ा और विभाग के सभी तबादले रद्द कर दिए गए।
खाद्य एवं रसद विभाग में मनमानी
खाद्य एवं रसद विभाग में स्थानांतरण बिना नियमों के किए गए। कर्मचारियों के अनुरोधों की अनदेखी की गई और सेवा अवधि या स्थायित्व जैसे महत्वपूर्ण मापदंडों का पालन नहीं हुआ।
स्वास्थ्य विभाग ने सभी तबादले रद्द किए
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्री ने अपने विभाग के सभी तबादले रद्द कर दिए। अन्य संवेदनशील विभागों जैसे आयुष, पशुधन, वन, कृषि में भी यही कदम उठाया गया।
पुराने कर्मचारी जमे रहे, नए हुए ट्रांसफर
परिषद का आरोप है कि जो कर्मचारी 12-15 साल से एक ही जगह तैनात हैं, उन्हें नहीं हटाया गया, जबकि कुछ नए कर्मचारियों का जबरन तबादला कर दिया गया। इससे कर्मचारियों का मनोबल टूट रहा है।
तबादले बनते जा रहे ‘उद्योग’
राज्य कर्मचारी परिषद ने आरोप लगाया है कि तबादलों में पैसे और सिफारिश का खेल चल रहा है। नीति के नाम पर दिखावा किया गया और मुख्यमंत्री की पारदर्शिता की कोशिशों पर पानी फेर दिया गया।
मुख्यमंत्री से कड़ी कार्रवाई की मांग
परिषद अध्यक्ष जेएन तिवारी ने मुख्यमंत्री से सभी विभागों की तबादला प्रक्रिया की उच्च स्तरीय जांच की मांग की है और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करने की बात कही है। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर समय पर कार्रवाई नहीं हुई तो कर्मचारी आंदोलन शुरू करेंगे।
नीति की साख पर संकट
अब सवाल ये उठ रहे हैं कि जब प्रमुख सचिव के अधीन विभाग ही नियमों का पालन नहीं कर पा रहे हैं, तो बाकी विभागों से क्या उम्मीद की जा सकती है? यह पूरा मामला सरकारी नीति और पारदर्शिता पर सवालिया निशान खड़ा करता है।
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