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बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना लगभग तय हो गया है और उन्होंने इसके लिए नामांकन भी भर दिया है। इससे यह चर्चा तेज हो गई है कि करीब 20 साल से चली आ रही उनकी सरकार के दौर का अब अंत हो सकता है।
जानकारी के मुताबिक, इस फैसले की तैयारी पिछले करीब 15 दिनों से चल रही थी। शुरुआत में चर्चा यह थी कि नीतीश कुमार के बेटे निशांत को राज्यसभा भेजा जाए। लेकिन बाद में यह विचार सामने आया कि नीतीश कुमार को ही राज्यसभा भेजना बेहतर विकल्प हो सकता है।
सूत्रों के अनुसार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस मामले पर अपने सहयोगियों से बातचीत की थी। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार की सेहत चिंता का विषय है और राज्यसभा की सीट उनके लिए सम्मानजनक विदाई हो सकती है। इसके बाद इस दिशा में बातचीत तेज हो गई।
बताया जा रहा है कि अमित शाह ने इस मुद्दे पर जदयू के तीन वरिष्ठ नेताओं — केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन ‘ललन’ सिंह, राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा और बिहार सरकार के मंत्री विजय कुमार चौधरी से कई दौर की चर्चा की। इसके बाद इन नेताओं ने नीतीश कुमार को इस फैसले के लिए मनाने की कोशिश की और उनसे लगातार बैठकें कीं।
चर्चा की शुरुआत निशांत के नाम से हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे बातचीत का रुख बदलकर नीतीश कुमार को राज्यसभा भेजने पर आ गया। इसी दौरान उन्हें यह भी याद दिलाया गया कि राज्यसभा की अगली सीटें दो साल बाद ही खाली होंगी, इसलिए अभी जाना बेहतर मौका हो सकता है।
बताया जाता है कि इस फैसले की जानकारी 3 मार्च तक नीतीश कुमार के परिवार के लोगों को भी नहीं थी। जब उन्हें पता चला, तब तक काफी देर हो चुकी थी। 4 मार्च को जदयू के वरिष्ठ नेता बिजेंद्र प्रसाद यादव ने नीतीश कुमार से मिलकर उन्हें रोकने की कोशिश भी की, लेकिन तब तक वे राज्यसभा के लिए नामांकन पत्र पर हस्ताक्षर कर चुके थे।
सूत्रों के मुताबिक बीजेपी भी इस फैसले को लेकर जल्दबाजी में थी। पार्टी के नेताओं का मानना था कि नीतीश कुमार लंबे समय तक मुख्यमंत्री पद पर नहीं रह पाएंगे। इसलिए सितंबर से पहले ही उन्हें राज्यसभा भेजने की योजना बनाई गई, ताकि भविष्य की राजनीतिक स्थिति को संभाला जा सके।
इस फैसले के बाद बिहार की राजनीति में आने वाले समय में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
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