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भारत-चीन रिश्तों में नई शुरुआत के संकेत, चीनी राजदूत ने दिखाई सकारात्मक उम्मीदें

भविष्य की ओर देख रहा है बीजिंग, प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी की सहमति को बताया अहम मील का पत्थर

नई दिल्ली में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान चीन के राजदूत शू फेइहोंग ने भारत-चीन संबंधों को लेकर आशावादी रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के नेताओं—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी चिनफिंग—ने पारस्परिक सहयोग और पड़ोसी मित्रता को मज़बूत करने के लिए एक निर्णायक सहमति बनाई है, जो भविष्य में द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जा सकती है।

हजारों साल की साझी विरासत का हवाला

राजदूत फेइहोंग ने भारत और चीन को “प्राचीन सभ्यताओं की धरोहर” करार देते हुए कहा कि इतिहास के अधिकांश कालखंड में दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण और गहरे संबंध रहे हैं। उन्होंने यह भी दोहराया कि यदि इतिहास में कुछ मतभेद रहे हैं, तो वे बेहद सीमित अवधि के रहे हैं।

“जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने भी कहा है, हमारे द्विपक्षीय इतिहास में असहमति की अवधि काफी सीमित रही है। हमें अतीत से सबक लेकर भविष्य की ओर देखना चाहिए।”

सीमा विवाद पर संकेत, लेकिन फोकस भविष्य पर

जब पत्रकारों ने सीमा विवाद के संभावित समाधान पर सवाल किया, तो फेइहोंग ने संतुलित जवाब देते हुए कहा कि चीन की प्राथमिकता भविष्य में संबंधों को मज़बूती देना है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के युवाओं में वह संभावना देखते हैं, जो द्विपक्षीय संबंधों को सकारात्मक दिशा दे सकती है।

नई उड़ानों और सहयोग की उम्मीद

राजदूत ने यह भी कहा कि 2020 से निलंबित भारत-चीन सीधी उड़ानें जल्द ही फिर से शुरू हो सकती हैं, जिससे लोगों के बीच संपर्क और व्यापार दोनों में इज़ाफा होगा। उन्होंने इसे “सामान्यीकरण की ओर एक महत्वपूर्ण कदम” बताया।

75वीं वर्षगांठ होगी खास

उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि 2025 में भारत और चीन के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना के 75 वर्ष पूरे होंगे। यह वर्ष दोनों देशों के लिए रणनीतिक और सांस्कृतिक साझेदारी को नई दिशा देने का उपयुक्त अवसर हो सकता है।

“यह एक ऐसा मोड़ है जहां दोनों देश अपने संबंधों को फिर से परिभाषित कर सकते हैं—विश्व मंच पर शांति, सहयोग और विकास के साझेदार के रूप में।”


निष्कर्ष:
जहां एक ओर सीमा मुद्दे और रणनीतिक चिंताएं बनी हुई हैं, वहीं राजदूत फेइहोंग के हालिया बयान भारत-चीन संबंधों में नए अध्याय की संभावना को ज़ाहिर करते हैं। यदि दोनों देश नेतृत्व स्तर पर बनी सहमति को ज़मीनी स्तर पर लागू कर पाते हैं, तो आने वाला दशक एशिया में स्थिरता और सहयोग की नई मिसाल बन सकता है।

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