कोलंबो: श्रीलंका ने एक ऐसा रणनीतिक कदम उठाया है, जिससे भारत के विरोधी देशों – चीन और पाकिस्तान – की चिंता बढ़ना तय है। श्रीलंका की सरकार भारत के साथ एक महत्त्वपूर्ण रक्षा समझौते को अंतिम मंजूरी देने की तैयारी में है, जो द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग को एक नए स्तर पर ले जाएगा।
संसद में जल्द पेश होगा रक्षा समझौता
श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमार दिसानायके ने घोषणा की है कि यह रक्षा समझौता जल्द ही संसद के पटल पर लाया जाएगा। उन्होंने विपक्ष की उन आलोचनाओं को खारिज किया जिसमें आरोप लगाया गया था कि उनकी सरकार ने भारत के साथ कोई “गुप्त” सैन्य समझौता किया है। दिसानायके ने स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच हुए समझौते पारदर्शी हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में हैं।
भारत विरोधी गतिविधियों पर कड़ा रुख
राष्ट्रपति ने यह भी दोहराया कि श्रीलंका की धरती का इस्तेमाल किसी भी भारत विरोधी गतिविधि के लिए नहीं होने दिया जाएगा। यह रुख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया श्रीलंका यात्रा के दौरान भी सामने आया था, जब उन्होंने दिसानायके को इस स्पष्ट नीति के लिए धन्यवाद दिया था।
ऐतिहासिक रक्षा साझेदारी की नींव
प्रधानमंत्री मोदी की 5 अप्रैल 2025 को हुई यात्रा के दौरान भारत और श्रीलंका ने पहली बार एक संस्थागत रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह पांच वर्षों तक प्रभावी रहेगा और इसमें सैन्य प्रशिक्षण, संयुक्त अभ्यास और सामरिक सहयोग शामिल हैं।
श्रीलंका के रक्षा सचिव थुइयाकोंथा ने बताया कि भारत पहले से ही हर साल लगभग 750 श्रीलंकाई सैनिकों को प्रशिक्षण देता है और यह रक्षा साझेदारी दोनों देशों के बीच विश्वास की मिसाल बन रही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह सहयोग अंतरराष्ट्रीय नियमों, संयुक्त राष्ट्र चार्टर और दोनों देशों के कानूनों का पूर्ण सम्मान करता है।
विपक्ष की आलोचना और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
हालांकि, श्रीलंकाई विपक्ष ने इस समझौते पर सवाल उठाए हैं। विशेष रूप से इसलिए क्योंकि मौजूदा सत्तारूढ़ गठबंधन की जड़ें जनता विमुक्ति पेरामुना (JVP) से जुड़ी हैं, जो 1987-90 के दौरान भारत के हस्तक्षेप के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व कर चुकी है। फिर भी, मौजूदा सरकार ने साफ किया है कि वह क्षेत्रीय स्थिरता और द्विपक्षीय विश्वास को प्राथमिकता देती है।
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