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“ये हमारे खून में है”: मिस्र की महिलाएं बेली डांस को बदनामी से निकाल फिर से अपना रही हैं

काहिरा:
एक समय मिस्र की सिनेमाई दुनिया की शान रहे बेली डांस ने अब अपनी प्रतिष्ठा काफी हद तक खो दी है। आज यह कला रूप अधिकतर नाइट क्लबों और शादियों तक सीमित रह गई है। लेकिन अब मिस्र की युवा महिलाएं इस पारंपरिक नृत्य को फिर से सम्मान दिलाने की कोशिश में जुटी हैं।


🩰 “इज्ज़त नहीं मिलती”

साफी अकीफ, जो बेली डांस की मशहूर कलाकार नायमा अकीफ की भतीजी हैं, कहती हैं,

“आज कोई महिला बेली डांसर बन जाए तो उसे समाज से इज्ज़त नहीं मिलती। शो खत्म होते ही लोग हमें सिर्फ एक वस्तु की तरह देखते हैं।”

साफी ने मिस्र में कभी मंच पर प्रस्तुति नहीं दी। वह अब विदेशी देशों में मिस्री नृत्य सिखाती हैं — जापान में उन्होंने तीन साल तक प्रशिक्षण दिया।


🌍 विदेशों में लोकप्रिय, देश में शर्म की नजर से देखा जाता है

सफा सईद, 32 वर्षीय प्रशिक्षक कहती हैं:

“लोग मुझसे पूछते हैं कि मिस्र में कहां अच्छा बेली डांस देखने को मिलेगा… लेकिन जवाब देना मुश्किल होता है।”

वे भी नायमा अकीफ से प्रेरित होकर इस कला में आई थीं। आज वे कोरियोग्राफर एमी सुल्तान की टीम का हिस्सा हैं, जो बेली डांस को एक कलात्मक विरासत के रूप में प्रस्तुत करने और UNESCO सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल कराने का प्रयास कर रही हैं।


📚 बेली डांस या बलदी?

एमी सुल्तान, जो पहले बैले डांसर थीं, बेली डांस को ‘बलदी’ कहती हैं — जिसका अर्थ है “अपने देश की आत्मा”।

“बलदी हमारे वजूद की रूह है, लेकिन आज इसे सतही मनोरंजन के तौर पर देखा जाता है।”

वे कहती हैं कि इस नृत्य की छवि पर उपनिवेशवाद का भी असर पड़ा है।
लेखिका शथा येहिया ने अपनी किताब Imperialism and the Heshk Beshk में लिखा कि ‘बेली डांस’ शब्द 19वीं सदी में फ्रांसीसी उपनिवेशवादियों द्वारा दिया गया, जिसने इस कला को “विदेशी और उत्तेजक” बना दिया।

“हेश्क बेश्क” एक मिस्री शब्द है, जो किसी महिला के कामुक हाव-भाव का प्रतीक बन गया — और धीरे-धीरे इसे अश्लीलता और अनैतिकता का पर्याय मान लिया गया।


🏫 शिक्षा से बदलाव की शुरुआत

2022 में सुल्तान ने Taqseem Institute की स्थापना की, जहां छात्राओं को सिर्फ नृत्य नहीं, बल्कि संगीत की समझ, इतिहास और सिद्धांत भी सिखाया जाता है।

यहाँ छात्राएं बाम्बा कश्शार, बदिया मसाबनी, तहीया कारिओका और सामिया गमाल जैसी ऐतिहासिक नृत्यांगनाओं के योगदान को जानती हैं।

“हम थिएटर जैसी जगह चाहते हैं — जहां हम नियमित रूप से प्रदर्शन कर सकें,” सईद कहती हैं।


🎭 UNESCO मान्यता की ओर कदम

सुल्तान ने UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में बेली डांस को शामिल कराने की प्रक्रिया शुरू की है, लेकिन यह एक लंबा रास्ता है और इसके लिए सरकारी सहयोग आवश्यक है।

फिलहाल, उनकी टीम काहिरा में अपनी अगली प्रस्तुति की तैयारी में जुटी है।
उम्म कुलथुम की आवाज़ में गूंजते संगीत पर वे नंगे पांव, पूरी तल्लीनता से “बलदी” में डूबी हैं।


❤️ “ये हमारे खून में है”

बचपन से नृत्य करने वाली सईद अब खुद मंच पर हैं, अपनी विरासत को जीती हुई।

“मुझे विश्वास है कि यह कला हमारे खून में बसी है,” वे मुस्कराते हुए कहती हैं।

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