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हाईकोर्ट की एकल पीठ ने एक अहम फैसले में साफ कहा है कि किसी कर्मचारी से दशकों तक काम लेने के बाद उसे पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। अगर नियुक्ति अवैध नहीं बल्कि केवल अनियमित थी और कर्मचारी ने लगातार लंबे समय तक सेवा दी है, तो उसे नियमित मानकर सभी लाभ देना जरूरी है।
सरकार को पेंशन और एरियर देने के निर्देश
कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि कर्मचारी की सेवा 27 अक्टूबर 1987 से नियमित मानी जाए। इसके साथ ही पेंशन प्रकरण तैयार कर पीपीओ और जीपीओ जारी किए जाएं और 30 अगस्त 2014 से एरियर सहित पेंशन का भुगतान किया जाए।
अगर तीन महीने में आदेश का पालन नहीं हुआ, तो सरकार को 6% वार्षिक ब्याज भी देना होगा। इसके अलावा मानसिक उत्पीड़न के लिए 50 हजार रुपये की क्षतिपूर्ति देने का भी निर्देश दिया गया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह आदेश न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहारावत ने पूर्णिमा सक्सेना बनाम मध्यप्रदेश शासन मामले में दिया। पूर्णिमा सक्सेना की नियुक्ति 27 अक्टूबर 1987 को करुणा नियुक्ति के तहत पीजी कॉलेज शिवपुरी में रजिस्ट्रार पद पर हुई थी। बाद में उनका तबादला शासकीय पीजी कॉलेज गुना कर दिया गया।
उन्होंने 30 अगस्त 2014 को सेवानिवृत्ति ली, लेकिन सेवा नियमित न होने का हवाला देकर उन्हें पेंशन नहीं दी गई।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
कोर्ट ने कहा कि विभाग खुद पहले यह स्पष्ट कर चुका था कि क्लास-2 गजेटेड पद के लिए लेखा प्रशिक्षण जरूरी नहीं है और इस पद के लिए लोक सेवा आयोग द्वारा कभी विज्ञापन भी जारी नहीं किया गया। ऐसे में शर्तें पूरी न होने का दोष कर्मचारी पर नहीं डाला जा सकता।
निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर सरकार ने किसी कर्मचारी से वर्षों तक नियमित वेतन पर काम लिया और उसे सेवानिवृत्त भी किया, तो बाद में पेंशन से इनकार करना गलत है। यह फैसला ऐसे कई कर्मचारियों के लिए राहत लेकर आया है, जिन्हें लंबे समय की सेवा के बाद भी पेंशन नहीं मिल पा रही थी।
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