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1. श्रवण कुमार: झोपड़ी से डॉक्टर बनने तक का सफर
राजस्थान के बालोतरा के नरेवा, खट्टू गांव के श्रवण कुमार ने गरीबी में पला-बढ़कर NEET 2025 में 556 अंक हासिल किए और ऑल इंडिया रैंक 9754 पाई।
उनके पिता रेखाराम मजदूरी करते हैं और शादियों में बर्तन धोकर परिवार चलाते हैं। खुद श्रवण 10वीं के बाद फैक्ट्री में काम करने लगे थे, लेकिन डॉक्टर बनने का सपना नहीं छोड़ा।
NGO ‘Fifty Villagers’ और शिक्षक चिमनाराम ने उन्हें आर्थिक और शैक्षणिक मदद दी। पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने भी श्रवण की तारीफ की और बताया कि श्रवण की मां को इंदिरा गांधी स्मार्टफोन योजना से मिला फोन उनकी ऑनलाइन पढ़ाई में मददगार बना।
2. किरण सांखला: मजदूर की बेटी ने रच दिया इतिहास
जोधपुर के बालेसर की किरण सांखला के पिता खुशालाराम माली खदानों में मजदूरी करते हैं। कठिन हालात के बावजूद किरण ने हार नहीं मानी और NEET 2025 में ऑल इंडिया रैंक 134 हासिल की।
गांव में शिक्षा की सुविधा कम थी, फिर भी उन्होंने खुद पढ़ाई कर सफलता पाई। उनके पिता ने कहा, “बेटी ने मेरा सपना पूरा कर दिखाया।” किरण की मेहनत अब पूरे गांव के लिए प्रेरणा बन गई है।
3. शुभ, रिद्धि और सिद्धि बत्रा: तीन भाई-बहनों का डॉक्टर बनने का सपना पूरा
हनुमानगढ़ जंक्शन के शुभ बत्रा और उनकी जुड़वां बहनें रिद्धि और सिद्धि ने NEET 2025 में एक साथ सफलता पाकर सबको चौंका दिया। शुभ ने पहले प्रयास में AIR 188 प्राप्त की, जबकि बहनों ने दूसरे प्रयास में कामयाबी हासिल की।
पिता डॉ. निशांत बत्रा, मां विनीता, और दादा केवलकृष्ण के मार्गदर्शन ने तीनों को सफलता की राह दिखाई। शुभ न्यूरोसर्जन बनना चाहते हैं। मां विनीता कहती हैं, “तीनों की सफलता हमारे लिए सपना सच होने जैसा है।“
निष्कर्ष:
ये कहानियां बताती हैं कि अगर हौसला हो और सही मार्गदर्शन मिले, तो गरीबी या संसाधनों की कमी भी सपनों की उड़ान नहीं रोक सकती। श्रवण, किरण और बत्रा परिवार की यह मेहनत देश के लाखों युवाओं को प्रेरणा देती है।
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