20 जून 2025
वर्तमान में इसराइल और ईरान के बीच छिड़े संघर्ष ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है: क्या दुनिया के इस्लामिक देश इसराइल के खिलाफ एकजुट हो सकते हैं? इतिहास और वर्तमान भू-राजनीतिक समीकरणों को देखें तो जवाब जटिल है — और शायद “ना” की ओर अधिक झुका हुआ।
1974 की एकजुटता की कल्पना और आज की हकीकत
1974 में पाकिस्तान में आयोजित ओआईसी (इस्लामिक सहयोग संगठन) शिखर सम्मेलन में तत्कालीन प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने जोश-ओ-खरोश में इस्लाम के लिए “खून का हर कतरा” देने की बात कही थी। उस समय इस्लामी देशों में राजनीतिक स्थिरता की अपेक्षा थी, और इसराइल को लेकर एक साझा नाराज़गी मौजूद थी।
लेकिन आज के हालात अलग हैं — इस्लामी देशों में आपसी मतभेद, सत्ता संघर्ष, क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता और पश्चिमी ताकतों के साथ जुड़ाव ने इस काल्पनिक एकता को ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर कर दिया है।
क्यों असहमति है इस्लामिक देशों में?
1. ईरान बनाम अरब दुनिया
ईरान और सऊदी अरब के बीच पुराना संघर्ष केवल शिया-सुन्नी मतभेद नहीं है, बल्कि यह क्षेत्रीय नेतृत्व और वैचारिक टकराव की लड़ाई है। यह विरोध सऊदी राजशाही और ईरान की क्रांतिकारी विचारधारा के बीच है। हाल में चीन की मध्यस्थता से कुछ नरमी आई है, लेकिन विश्वास अब भी कमजोर है।
2. तुर्की की दोहरी नीति
तुर्की इसराइल की आलोचना तो करता है, लेकिन खुद उसके साथ राजनयिक संबंध भी रखता है। यहां तक कि राष्ट्रपति अर्दोआन ने पहले ईरान के परमाणु कार्यक्रम की आलोचना भी की थी। इसके अलावा, सीरिया में ईरान समर्थक ताकतों को तुर्की की भूमिका के कारण पीछे हटना पड़ा।
3. मध्य पूर्व में अमेरिका का प्रभाव
अरब देशों में फैले अमेरिकी सैन्य ठिकाने और साझेदारियाँ इस्लामी देशों की स्वतंत्र नीतियों में बाधक हैं। अमेरिका के बिना इस इलाक़े में कोई सैन्य या कूटनीतिक कदम उठाना मुश्किल होता है।
ओआईसी और अरब लीग: नाम के संगठन
विशेषज्ञों का मानना है कि ओआईसी जैसी संस्थाएं केवल प्रतीकात्मक रह गई हैं। नीतिगत या रणनीतिक स्तर पर इनकी भूमिका लगभग नगण्य है। कई बार बयान जारी होते हैं, लेकिन ठोस कार्रवाई देखने को नहीं मिलती।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद मुदस्सिर क़मर के अनुसार, “बातों में समर्थन और वास्तविक सहयोग में बहुत फर्क होता है। इस्लामी देश आज भी अपने-अपने हितों में उलझे हैं।”
क्या ईरान की हार पूरे क्षेत्र को बदल देगी?
अगर ईरान इस संघर्ष में कमजोर पड़ता है या हार जाता है, तो पश्चिम एशिया का शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है:
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इसराइल का प्रभुत्व और बढ़ेगा
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ग़ज़ा और वेस्ट बैंक पर नियंत्रण और मजबूत होगा
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ईरान समर्थित समूह कमजोर पड़ेंगे
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रूस का प्रभाव घटेगा
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चीन को ऊर्जा के लिए अमेरिका के सहयोगियों पर और निर्भर होना पड़ेगा
अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ स्टैनली जॉनी का मानना है कि “ईरान की कमजोरी इसराइल के लिए बड़ी रणनीतिक जीत होगी। इससे रूस और चीन दोनों को पश्चिम एशिया में झटका लगेगा।”
पाकिस्तान की कोशिशें और सीमाएं
पाकिस्तान बार-बार इस्लामिक देशों की एकता की बात करता रहा है, लेकिन उसकी खुद की स्थिति भी स्पष्ट नहीं है। अफ़ग़ानिस्तान से लेकर अमेरिका के साथ सैन्य सहयोग तक — पाकिस्तान कई बार विरोधाभासी भूमिकाओं में रहा है।
हाल ही में पाकिस्तानी फील्ड मार्शल की वॉशिंगटन यात्रा को भी इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल से जोड़कर देखा जा रहा है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका पाकिस्तान की स्थिति और उसकी संभावित भूमिका को लेकर रणनीति बना रहा है।
निष्कर्ष: केवल इस्लाम के नाम पर एकता संभव नहीं
धार्मिक पहचान और भावनाओं से परे, इस्लामी देशों की नीतियां अब आर्थिक हित, सुरक्षा गठजोड़, और क्षेत्रीय प्रभाव पर आधारित हैं। इसलिए सिर्फ़ इस्लाम के नाम पर लामबंदी की उम्मीद रखना यथार्थवादी नहीं है।
इस संघर्ष की जड़ें धार्मिक से अधिक राजनीतिक और रणनीतिक हैं — और इसका हल भी इसी स्तर पर तलाशना होगा।
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